शॉर्ट और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन अगर कोई एनआरआई भारत में अपने किसी कैपिटल असेट को ट्रांसफर करता है तो उस पर टैक्स लगता है। हालांकि, ये टैक्सेशन करते वक्त डबल टैक्सेशन अवॉइडेंस एग्रीमेंट के तहत ये ध्यान रखा जाता है कि उस पर दो बार टैक्स ना लगे। कैपिटल गेन पर कितना टैक्स लगेगा ये इस बात पर निर्भर करता है कि असेट कैसा है और कब तक वह एक एनआरआई के पास रहा है। यहां कैपिटल असेट से मतलब किसी भी तरह की प्रॉपर्टी से है, जिसमें किसी कंपनी के शेयर्स और सिक्योरिटीज भी शामिल हैं। अगर किसी इममूवेबल प्रॉपर्टी या किसी कंपनी के अनलिस्टेड शयेर्स को 24 महीने से अधिक अपने पास जाए तो उसे लॉन्ग टर्म कैपिटल असेट कहेंगे, इससे कम रखने पर उसे शॉर्ट टर्म कैपिटल असेट कहा जाएगा। वहीं अगर किसी कंपनी के लिस्टेड शेयर्स आपके पास 12 महीने से अधिक के लिए हैं तो उसे लॉन्ग टर्म कैपिटल असेट माना जाएगा।ऐसे होता है कैपिटल गेन का कैल्कुलेशन किसी कैपिटल असेट के ट्रांसफर से होने वाले कैपिटल गेन का कैल्कुलेशन करने के लिए सबसे पहले उसके अधिग्रहण की लागत, उसे बेहतर बनाने की कॉस्ट और उस पर हुए अन्य खर्चों को सेल की रकम में से घटा दिया जाता है। जो बची हुई रकम आती है वही शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म होगी, जो इस बात पर निर्भर करेगी कि वह प्रॉपर्टी कैसे ही और आपके पास कितने दिनों तक के लिए थी। किसी भारतीय कंपनी के शेयर या डिबेंचर्स को बेचने से हुए कैपिटल गेन का कैल्कुलेशन करते वक्त एक एनआरआई को ये सुविधा मिलती है कि वह अधिग्रहण की लागत और उस पर हुए खर्चों को अपनी विदेशी करंसी में बदल सके, ताकि कैल्कुलेशन में दो तरह की करंसी ना रहें। उसके बाद जो कैपिटल गेन आता है, उसे भारतीय करंसी में बदल दिया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि फॉरेन करंसी में होने वाले उतार-चढ़ाव को बैलेंस किया जा सके।
Source: Navbharat Times November 17, 2020 10:37 UTC