चुनाव आते ही चारों तरफ नए-नए नारे छा जाते हैं। दरअसल चुनावी नारों का सिलसिला शुरुआत से ही चला आ रहा है। वेवर ने कहा था 'नेता और उसके वादे प्रॉडक्ट की तरह हैं जिसे जनता के बीच लॉन्च किया जाता है।' आइए जानते हैं हमारे देश में कौन-कौन से नारे 'लॉन्च' किए गए और जनता पर उनका क्या असर पड़ा।1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान मनोबल बढ़ाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का यह नारा, आगे कांग्रेस के चुनावी समर में भी खूब हिट हुआ। उस समय देश में खाद्य सामग्री की कमी हो गई थी। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी नारे के आगे 'जय विज्ञान' जोड़ दिया।70 के दशक में सोशलिस्टों का यह नारा चुनावी राजनीति में बड़ा बदलाव लेकर आया। पहली बार जातीय आधार पर वोटरों का बड़ा बंटवारा हुआ और एक नया ओबीसी वोटर वर्ग खड़ा हुआ। यह आवाज मंडल कमिशन और पिछड़ों के आरक्षण के अंजाम में तब्दील हुई।1971 में इंदिरा गांधी के चुनावी अभियान को इस नारे ने ऐतिहासिक सफलता दिलाई और 'इंदिरा इज इंडिया' की जमीन तैयार की। इसके बाद राजीव गांधी ने भी इस नारे का प्रयोग किया।इमर्जेंसी के दौरान जयप्रकाश नारायण ने यह नारा दिया था जो आपातकाल के बाद विपक्ष ने पकड़ लिया। बड़ी विपक्षी पार्टियां जनता पार्टी के तहत आ गईं और 1977 के चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया।1989 में कांग्रेस का विजय रथ रोकने में सफल रहे विपक्ष की अगुवाई कर वीपी सिंह के लिए गढ़ा यह नारा खूब चर्चा में रहा। कांग्रेस ने भी जवाबी नारा गढ़ा 'फकीर नहीं राजा है, सीआईए का बाजा है।'1993 के यूपी के विधानसभा चुनाव में राम लहर पर सवार बीजेपी को रोकने के लिए एसपी-बीएसपी ने गठबंधन किया। इसके साथ ही यह नारा भी अस्तित्व में आया। अंतत: बीजेपी का विजय रथ रुक ही गया।यह नारा बीएसपी के संस्थापक और कांशीराम ने 80 के दशक में दिया था। लेकिन बाद में मायावती इसपर घिर गईं और वह बहुजन की जगह 'सर्वजन' की बात करने लगीं।1996 में लखनऊ की रैली में इस नारे का सबसे पहले उपयोग हुआ। इसके बाद वाजपेयी को केंद्र की सत्ता में काबिज होने का मौका मिला। हालांकि वह पहली बार केवल 13 दिन तक ही प्रधानमंत्री रह सके।इस नारे के साथ 2004 में कांग्रेस ने बीजेपी को हराकर केंद्र की सत्ता पा ली। एक बार फिर देश की सबसे पुरानी पार्टी ने आम आमदी को टारगेट करके वापसी कर ली। कांग्रेस ने देश के मिडल क्लास को ध्यान में रखा था।यह नारा 2010 के विधानसभा चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस ने दिया था। ममता बनर्जी की कविता की किताब पर इस स्लोगन का प्रयोग किया गया था और बाद में पार्टी की पत्रिका का भी यही नाम दिया गया।2014 के आम चुनाव ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाते हुए चुनाव अभियान चलाया। मोदी की लोकप्रियता का रंग दिखा और बीजेपी ने बहुमत के साथ 10 साल बाद वापसी की। 'अच्छे दिन आने वाले हैं' का नारा भी इसी चुनाव अभियान में दिया गया।2014 के चुनाव में कांग्रेस ने यह नारा दिया लेकिन यह असर नहीं दिखा सकता। कांग्रेस ने सोनिया गांधी की अगुवाई में राहुल गांधी को आगे रखते हुए यह नारा दिया था।लोकसभा चुनावों का ऐलान हो चुका है और ऐसे में फिर से कई नारे चर्चा में हैं। बीजेपी अपने इस नारे से नरेंद्र मोदी की दोबारा वापसी की कोशिश में जुटी है और सरकार के 5 साल के काम भी गिना रही है।वायनाड सीट पर एनडीए से राहुल गांधी को तुषार वेल्लापल्ली देंगे चुनौतीXकांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा केरल के वायनाड सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद से यह सीट चर्चा में आ गई है। लेफ्ट ने जहां इस सीट से राहुल को हराने की बात कही है वहीं, बीजेपी ने भी इस सीट पर राहुल को घेरने की योजना बना ली है। केरल में बीजेपी की सहयोगी पार्टी भारत धर्म जनसेना (बीडीजेएस) के अध्यक्ष तुषार वेल्लापल्ली राहुल के खिलाफ वायनाड सीट से लड़ेंगे। राज्य में बड़े हिंदू समुदाय का प्रतिनिधत्व करने वाले बीडीजेएस के दम पर एनडीए गठबंधन को यहां बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। एनडीए में शामिल बीडीजेएस को केरल में 5 सीटें मिली हैं। तुषार को पहले त्रिशूर से टिकट दिया गया था और वह प्रचार भी शुरू कर चुके थे। हालांकि उन्होंने तब यह कहा था कि अगर राहुल गांधी वायनाड से चुनाव लड़ते हैं तो पार्टी की उम्मीदवारी में कुछ बदलाव किया जा सकता है। सोमवार को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने साफ कर दिया कि तुषार ही वायनाड से लड़ेंगे।दरअसल, केरल में बीडीजेएस पार्टी का गठन दिसंबर 2015 में हुआ। पार्टी इस मान्यता के साथ खड़ी हुई कि केरल में वर्षों से एलडीएफ और यूडीएफ सरकारों में अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व मिला है, इसलिए राज्य में एक हिंदुओं की बात करने वाली पार्टी भी जरूरी है। पार्टी की स्थापना के साथ ही साफ हो गया था कि केरल में अब हिंदू संगठनों का बड़ा फ्रंट बनने वाला है।बीडीजेएस के गठन के पीछे राज्य के प्रभावशाली संगठन श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (एसएनडीपी) के नेता थे। यह संगठन राज्य में सबसे ज्यादा आबादी वाले हिंदू ग्रुप- एझावा पिछड़ा समुदाय (करीब 20.9%) के कल्याण के लिए काम करता है। एसएनडीपी के महासचिव वेल्लाप्पली नतेशन हैं, जो केरल के प्रभावशाली लोगों में से हैं। तुषार वेल्लाप्पली नतेशन के बेटे हैं।एसएनडीपी का सामाजिक और राजनीतिक रुतबा है। खासकर दक्षिणी और मध्य केरल में। कई पार्टियों के नेता नतेशन के दरवाजे जाते रहे हैं। हाल ही में सबरीमाला मुद्दे को लेकर केरल के सीएम विजयन भी चर्चा करने पहुंचे थे। केरल की स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार नतेशन ने पिछले साल सबरीमाला कर्मा समिति की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि यह हिंदुओं के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं करती है। नतेशन का इशारा सबरीमाला मुद्दे पर ऊंची जातियों के प्रतिनिधियों की मीटिंग पर था। वह कई मौकों पर लेफ्ट और कांग्रेस, दोनों की आलोचना कर चुके हैं।वायनाड लोकसभा सीट के तहत सात विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इस संसदीय क्षेत्र में मनंतावडी, तिरुवंबडी,
Source: Navbharat Times April 02, 2019 04:40 UTC