नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। लालकिला में रविवार को भारत पर्व का शुभारंभ होगा। इसमें देश की विविधता के दर्शन तो होंगे ही साथ ही यह दर्शकों को देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत करने वाला होगा। गणतंत्र दिवस के अवसर पर हर साल छह दिवसीय भारत पर्व का आयोजन होता है।इसका आयोजन पर्यटन मंत्रलय करता है। इस बार के पर्व की थीम महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती है। ऐसे में इस पर्व में राष्ट्रपिता बापू के जीवन और विचार से भी रूबरू होने का मौका मिलेगा। 26 जनवरी को शाम 5 बजे से शुरू होगा, जो रात्रि 10 बजे तक चलेगा। 27 जनवरी से 31 जनवरी तक यह दोपहर 12 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहेगा। इसमें प्रवेश के लिए पहचान प्रमाण पत्र अनिवार्य होगा।पर्व की तैयारियां जोरों पर है। लालकिला के ठीक सामने सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति के लिए बड़ा स्टेज बनाया गया है। इस पर्व में विभिन्न राज्यों व मंत्रलयों के थीम स्टॉल, हस्त शिल्प के स्टाल और विभिन्न राज्यों के खानपान के स्टाल प्रमुख होंगे।इसके अलावा भारत पर्व के दौरान गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजपथ पर प्रदर्शित की जाने वाली झांकियां भी इसमें देखी जा सकेंगी। राजपथ पर गणतंत्र दिवस पर परेड देखने के लिए देश के कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं। इसके लिए भोर से ही कारवां राजपथ की ओर बढ़ने लगता है।उसमें भी सुरक्षा कारणों से मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद होने तथा वाहनों के प्रवेश पर रोक के कारण कई किलोमीटर से लोगों को पैदल चलकर वहां तक पहुंचना पड़ता है। पर कुछ साल पहले तक की ही बात है जब पुरानी दिल्ली के लोग घर बैठे ही परेड का लुत्फ उठाते थे। तब राजपथ की परेड पुरानी दिल्ली के सड़कों से भी गुजरती थी, जिसे देखने के लिए लोग न जाने कहां-कहां से पुरानी दिल्ली पहुंचते थे।परेड देखने की तैयारियां काफी पहले से शुरू हो जाती थीं। गलियों और सड़कों को सजाया जाने लगता था। हर जगह तिरंगे लहरा रहे होते थे। सड़क के दोनों और तख्त और कुर्सियां डाली जाती थीं। चाट-पकौड़ी की भी दुकानें लग जाती थीं। फुटपाथ से लेकर छत और छज्जे लोगों से भरे होते थे। तकरीबन 11.30 परेड चांदनी चौक की सड़क से गुजरती थी। लोग फूलों की बारिश करते थे।परेड के बाद तीन दिन तक लालकिला चांदनी चौक वालों के मस्ती और घूमने का मुख्य ठिकाना होता था, क्योंकि झांकियां इसी में देखने के लिए रखी जाती थीं। चांदनी चौक के कारोबारी प्रदीप गुप्ता उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि तब वे स्कूल में पढ़ते थे। उनके पिता की कटरा अशर्फी में कपड़े की दुकान थी। ऐसे में कटरे के सामने ही सड़क किनारे फुटपाथ पर तख्त लग जाता था।तख्त लगना मान-सम्मान का भी प्रतीक होता था। तब चांदनी चौक में अलग ही जश्न का माहौल हुआ करता था। आज तिरंगे वाली टोपी का चलन है, जबकि उस समय सफेद टोपी को आजादी का प्रतीक माना जाता था। तब लोग खासकर बुजुर्ग सफेद टोपी लगाकर परेड देखने आते थे। घरों में अच्छे पकवान बनते थे। कूचे व कटरों के मुख्य द्वारों को फूलों से सजाया जाता था। अच्छी तरह सफाई होती थी। पूरे सड़क किनारे जगह-जगह तिरंगे लगाए जाते थे। कागज की पतंगें लटकाई जाती थीं। टॉउन हाल की तो विशेष सजावट और लाइटिंग होती थी।नए कपड़े पहनकर लोग तख्तों पर आकर बैठ जाते थे। परेड के आने के समय तक इतनी भीड़ हो जाती थी कि कोई हिल भी नहीं सकता था। इसलिए लोग सुबह आठ बजे से ही पहुंचकर अपने लिए स्थान चुन लेते थे। यही हाल कमोबेश छतों और छज्जों पर होता था। खासकर, महिलाएं ऊपर से परेड को देखती थीं। परेड अजमेरी गेट से नया बाजार, लाहौरी गेट हुए खारी बावली फिर फतेहपुरी मस्जिद होते हुए चांदनी चौक में पहुंचती थी। इनमें टैंक, राकेट और युद्ध के अत्याधुनिक साज सामानों के साथ राज्यों व मंत्रलयों की झांकियां होती थीं।इस दौरान देशभक्ति के नारों से आसमान गूंजने लगता था। यह परेड लालकिला में जाकर संपन्न होता था। यह आजादी के बाद से ही चलता आ रहा था। पर वर्ष 2000 के आस-पास सुरक्षा कारणों से परेड का रास्ता बदल दिया गया। अब यह बहादुरशाह जफर मार्ग और सुभाष मार्ग होते हुए सीधे लालकिला पहुंचता है।Posted By: Pooja Singhडाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस
Source: Dainik Jagran January 26, 2020 09:22 UTC