भारतीय रिजर्व बैंक ( RBI ) का कैश रिजर्व केंद्र सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच टकराव का कारण बन रहा है। देश का राजकोषीय घाटा कम करने में आरबीआई पहले भी सरकार की थोड़ी-बहुत मदद करता रहा है। लेकिन मौजूदा समय में वर्तमान एनडीए सरकार और आरबीआई के बीच रिजर्व ट्रांसफर के मुद्दे ने बेहद विवादास्पद रुख ले लिया है।कई दिग्गज अर्थशास्त्रियों ने केंद्र सरकार को रिजर्व ट्रांसफर को आरबीआई की स्वायत्तता के साथ ही देश की अर्थव्यवस्था की सुरक्षा के लिए घातक बताया है। यही नहीं, मामले का राजनीतिकरण भी हो गया। विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए आरबीआई के रिजर्व का इस्तेमाल करना चाहती है।बहरहाल, इसमें कोई शक नहीं कि आरबीआई का कैश रिजर्व भरपूर है। कैश रिजर्व के मामले में आरबीआई का दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों में चौथा स्थान है। ऐसी परिस्थिति में सवाल यह उठता है कि आरबीआई का बैंलेश शीट आखिर कितना मजबूत होना चाहिए? क्या उसे सरकार को भुगतान रोककर अपने रिजर्व में यूं ही बढ़ोतरी करते रहनी चाहिए? क्या आरबीआई के पास इतना रिजर्व है कि वह इसका इस्तेमाल वित्तीय संकट से जूझ रहे सरकारी बैंकों को मजबूत करने और राजकोषीय घाटा कम करने में करे? किसी भी तरह का राजनीतिक बखेड़ा खड़ा करने से पहले शायद ही इन सवालों के जवाब ढूंढे जाते हैं।आरबीआई दुनियाभर के सर्वाधिक रिजर्व वाले केंद्रीय बैंकों में से एक है और इसका कैपिटल (इक्विटी प्लस रिजर्व्स) टु एसेट्स रेशियो 26.8% है। केवल नॉर्वे, रूस, मलेशिया और कोलंबिया के कैपिटल रेशियो भारत के केंद्रीय बैंक से अधिक हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि आरबीआई बैलेंस शीट के रिस्क के आकलन में सबसे रूढ़ीवादी नजर आता है और किसी भी ब्लैक स्वान (अर्थव्यवस्था में अचानक आई बहुत बड़ी गिरावट) से निपटने के लिए अपने खजाने को लबालब रखना चाहता है।इजरायल, चिली और थाईलैंड के केंद्रीय बैंक नाम मात्र का रिजर्व रखते हैं, जबकि बैंक ऑफ इंग्लैंड और यूएस फेडरल रिजर्व का कैपिटल रेशियो 0.9% है। पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना का कैपिटल रेशियो महज 0.1% है। दुनिया में नॉर्वे के केंद्री बैंक का कैपिटल टु टोटल असेट रेशियो सर्वाधिक 40%, रूस का 36%, मलेशिया का 30 %, भारत का 26.8 %, स्विट्जरलैंड का 16%, इंडोनेशिया का 12%, फ्रांस का 10.7%, जर्मनी का 8%, अमेरिका का 0.9% और चीन का 0.1% है।आरबीआई के 9.7 लाख करोड़ रुपये के रिजर्व में से कॉन्टिजेंसी फंड (जिसे बिल्कुल भी नहीं छुआ जा सकता) 2.3 लाख करोड़ रुपये है, जबकि रिवैल्यूएशन रिजर्व (या अनरियलाइज्ड गेन) सात लाख करोड़ रुपये के आसपास है। इन तथ्यों के मद्देनजर क्या इसका मतलब निकलता है कि आरबीआई को सरकार के साथ अपने रिजर्व का कुछ हिस्सा सरकार के साथ साझा करना चाहिए? कुछ लोगों का जवाब 'हां' है। हालांकि, आरबीआई का तर्क है कि भारत का चालू खाता घाटा और 'रिजर्व करेंसी' (डॉलर या यूरो) की अनुपस्थिति के कारण उसे भारी मात्रा में रिजर्व रखने की जरूरत है।
Source: Navbharat Times December 18, 2018 04:22 UTC