महंगाई को लेकर पाक में प्रदर्शनों का दौर जारीहाइलाइट्स पाक की मुद्रा पूरे एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करंसी बन गई हैचीन को छोड़कर पाकिस्तान में विदेशी निवेश में भारी कमी दर्ज की गई हैजर्जर अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए इमरान खान ने अधिकारियों की टीम बदल दीIMF ने बेहद कड़े शर्तों के साथ पाकिस्तान को ऋण दिया है, पाक में इसको लेकर काफी विरोधपाकिस्तान दिनों-दिन क्यों दिवालिया होने की ओर बढ़ता जा रहा है? अंतरराष्ट्रीय मुद्दा कोष (आईएमएफ) और वर्ल्ड बैंक से मिली करोड़ों डॉलर की मदद कहां जा रही है? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि हमारे पड़ोसी देश की अर्थव्यवस्था के हर दिन रसातल में जाने की खबरें आ रही हैं। एक डॉलर के मुकाबले पाकिस्तानी रुपया 163 तक चला गया है। हर 100 में से 30 रुपया पाकिस्तान का कर्जा चुकाने में ही चला जा रहा है। इसके अलावा आतंक का पोषक राष्ट्र सबसे अधिक खर्च डिफेंस में कर रहा है।पाकिस्तान की इकॉनमी भी वहां की मुद्रा के अवमूल्यन, घटती जीडीपी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमत के कारण प्रभावित हुई है। वहां बजट घाटा 1990 के बराबर पहुंच गया है, जब देश लगभग दिवालिया हो गया था। इन सबके बीच पाक पर लगी बंदिशों ने हालात को और खराब कर दिया है। वहां की मुद्रा एक साल में 40 फीसदी से अधिक गिर चुकी है। है और पूरे एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करंसी बन गई है। चीन को छोड़कर बाकी सभी विदेशी निवेश में गिरावट आई है।पाकिस्तान के पीएम इमरान खान ने जर्जर अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए अपने वित्त अधिकारियों की पूरी टीम बदल दी, लेकिन अब तक बेहतरी के कोई संकेत नहीं मिले हैं। उनका न्यू पाकिस्तान बनाने का सपना टूटता दिखने लगा है और वह अभी से विपक्ष के निशाने पर आ गए हैं। इस पर अपने डिफेंस बजट पर पूरी दुनिया में जीडीपी का सबसे अधिक खर्च करने के कारण उसके पास बुनियादी जरूरतों के लिए कोई फंड नहीं बचता। वहीं, आईएमएफ से लोन लेने के बाद पाकिस्तान की हालत और टाइट हो गई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्दा कोष की शर्तें बेहद कड़ी हैं। वह इस पैसे से विदेशी कर्ज नहीं चुका पाएगा। ऐसे में लोन मंजूर होने के बाद पाकिस्तानी रुपये का एतिहासिक अवमूल्यन हो गया। उसके सामने यह भी दिक्कत थी कि अगर वह इस लोन से इनकार करता तो दिवालिया होने का खतरा था।पाकिस्तान मौजूदा आर्थिक संकट से उबरने के लिए अपने सदाबहार दोस्त चीन की ओर भी उम्मीद लगाए बैठा है। लेकिन दिलचस्प बात है कि उसकी इस दुर्दशा के लिए भी चीन मुख्य रूप से जिम्मेदार है। जानकारों के अनुसार चीन ने पाकिस्तान को इस तरह कर्ज के बोझ में डाल दिया कि अगले कई वर्षों तक उसका इससे निकल पाना बेहद कठिन होगा। फिलहाल सिर्फ चीन से 50 बिलियन डॉलर से अधिक का कर्जदार हो चुका है। अपने जिगरी दोस्त को आर्थिक संकट से बाहर निकालने में चीन ने अभी तक रुचि नहीं दिखाई है।अगर पाक ने आतंकवाद को लेकर अपनी नीति नहीं बदली तो स्थिति और खराब हो सकती है। पाक को एफटीएफ ने जब से ग्रे लिस्ट में डाला है, तब से उस पर बहुत आर्थिक चोट पहुंची है। इस लिस्ट के अनुसार विदेश से मिलने वाली कर्ज की सीमा तय होती है। ब्लैक लिस्ट होने का खतरा मंडरा रहा है।पाकिस्तान के पास मात्र 11 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा है, जिससे देश का केवल दो महीने का खर्च चल सकता है। उसकी अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 300 बिलियन डॉलर है। निर्यात बुरी तरह घट गया है। हाल के दिनों में विदेशी कर्ज का संकट 1990 की स्थिति में पहुंचने को है। पाकिस्तान अपनी इकॉनमी का 11% डिफेंस पर खर्च कर देता है। इससे आर्थिक स्थिति और जर्जर हो जाती है। भारत इकॉनमी का 3 फीसदी ही खर्च करता है। पाक की इकॉनमी महज 3 फीसदी के दर से विकास कर रही है, महंगाई दर 10 फीसदी तक पहुंचने को है। आईएमएफ ने पैकेज देने की शर्तें बेहद कड़ी रखी हैं। इसमें एक शर्त यह भी है कि इस पैसे से विदेशी कर्ज की किस्त नहीं चुकाई जाएगी। पाक में इसको लेकर गुस्सा है
Source: Navbharat Times July 04, 2019 05:02 UTC