ICC World Cup 2019: इंग्लैंड के खिलाफ हार में छिपा बड़ी जीत का मंत्र - News Summed Up

ICC World Cup 2019: इंग्लैंड के खिलाफ हार में छिपा बड़ी जीत का मंत्र


तरुण गुप्त। ICC World Cup 2019: बर्मिघम में भारत को इंग्लैंड के हाथों इस विश्व कप में पहली हार का सामना करना पड़ा। मैं इसे एक दिन विशेष का खराब प्रदर्शन ही कहूंगा। मुझे अभी भी विश्वास है कि 14 जुलाई को लॉर्ड्स के मैदान पर विश्व कप ट्रॉफी उठाने की संभावनाओं के लिहाज से हम अभी भी सबसे बेहतर स्थिति में हैं। हालांकि, जैसा कि हर एक नाकामी के साथ होता है, वैसे ही इस हार में भी कुछ चेतावनियां छिपी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।बल्लेबाजी में मध्य क्रम और निचले क्रम की कमजोरी विश्व कप के पहले से ही भारत की एक बड़ी चिंता बनी हुई है। दुर्भाग्यवश यह पहेली टूर्नामेंट के बीचोंबीच भी लगातार उलझी हुई है। शिखर धवन की चोट ने मुश्किलें बढ़ाकर इस कमजोरी को और उजागर कर दिया। राहुल उनकी जगह भर पाने में सक्षम नहीं हुए हैं और यह महसूस करने में हमने कुछ ज्यादा ही समय ले लिया कि विजय शंकर बल्लेबाजी क्रम में चौथे नंबर के लिए शायद सबसे उपयुक्त दावेदार नहीं हैं। ऐसी स्थिति में वनडे क्रिकेट में विश्व के दो शीर्ष बल्लेबाजों विराट कोहली और रोहित शर्मा पर निर्भरता कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। रविवार को इंग्लैंड के खिलाफ भी दोनों ने उम्दा बल्लेबाजी की, लेकिन फिर भी हम हार गए। पांच अर्धशतक के साथ कप्तान कोहली और तीन शतक के साथ उनके नायब रोहित बेहतरीन दौर में हैं, लेकिन अगर कहीं औसत का निर्मम कानून उन पर लागू हो गया और ईश्वर न करे कि टूर्नामेंट में अहम मौकों पर अगर वे विफल हो गए, तब क्या हमारे पास उनकी भरपाई के लिए पर्याप्त विकल्प हैं? रिषभ पंत, जिन्हें शुरुआत से ही इस टीम का हिस्सा होना चाहिए था, उनमें और हार्दिक पांड्या में करिश्माई काबिलियत तो है, मगर रविवार को इंग्लैंड के खिलाफ जिस मुश्किल लक्ष्य का पीछा करने का अवसर था, उसमें आपको ऐसे इक्का-दुक्का चमकदार प्रदर्शनों से अधिक की दरकार होती है।भारतीय क्रिकेट में अपने अमूल्य योगदान के बावजूद महेंद्र सिंह धौनी की भूमिका पर विचार करना बेहद जरूरी है जो एक बल्लेबाज के रूप में अपनी स्वर्णिम आभा की छायामात्र बनकर रह गए हैं। एमएसडी अपनी ख्याति के अनुरूप बल्लेबाजी नहीं कर रहे हैं। अपने कुशाग्र क्रिकेटीय मस्तिष्क और विकेटकीपिंग कौशल के बावजूद पारी की शुरुआत में स्ट्राइक रोटेट न कर पाने और आत्मविश्वास के साथ अंत में मैच को झोली में डालने की उनकी क्षमताओं में आई कमी किसी से छिपी नहीं रह गई है। क्या वह अभी भी अंतिम एकादश में बने रहने के हकदार हैं? हां। क्या हम उन पर पहले की तरह संकटमोचन की भूमिका निभाने का भरोसा रख सकते हैं? नहीं। हालांकि महान खिलाड़ियों की एक विशेषता यह भी होती है कि वे अक्सर खेल समीक्षकों के आकलन को गलत साबित करते हैं। विश्व कप में भारत की संभावनाओं को देखते हुए क्या हम यह आशा कर सकते हैं कि धौनी भी इस चमत्कार को दोहरा पाएंगे? बहरहाल हार से ज्यादा भारतीय प्रशंसकों को यह बात अधिक साल रही है कि टीम ने कैसे आत्मसमर्पण कर दिया। पांच ओवरों में 70 रन बनाना एक दुरूह चुनौती अवश्य है, लेकिन यह मौजूदा दौर के बल्लेबाजों के बूते बाहर की बात तो बिल्कुल नहीं। यह देखना बहुत अजीब है कि कोई टीम जीत से 30 रन दूर रह जाए जबकि उसके पांच विकेट सुरक्षित हों। विकेट बचाने और टिके रहने की तुलना में जीतने की कोशिश की गई होती, तो हद से हद यही होता कि आप ऑलआउट होकर तकरीबन 40 से 50 रनों से हार जाते। धौनी के 31 गेंदों में 42 अविजित रन भले ही संतोषजनक प्रयास लगें, लेकिन परिस्थितियों के हिसाब से यह एकदम अपर्याप्त था। जब चौके-छक्के लगाने की जरूरत थी तब धौनी और केदार जाधव का एक-एक रन लेने का मिजाज या फिर विकेट हाथ में होने के बावजूद हवाई शॉट लगाने से परहेज बहुत अचंभित करता है। इससे वर्ष 1994 में वेस्टइंडीज के खिलाफ कानपुर के उस कुख्यात मैच की यादें ताजा हो गईं जब मनोज प्रभाकर और नयन मोंगिया ने रन गति बढ़ाना मुनासिब नहीं समझा था। संयोग से प्रभाकर ने उस मैच में शतक लगाया, फिर भी निरीह आत्मसमर्पण बेहद निकृष्ट और निराश करने वाला था।अब आगे की राह क्या हो?


Source: Dainik Jagran July 02, 2019 06:11 UTC



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