पीने वाले पी ही रहे हैं और वो भी दो-ढाई गुना ज्यादा दाम देकर। हालांकि बंदी के विरोधी अगर कुछ हैं तो समर्थकों की संख्या भी कम नहीं है। खासकर ऐसी महिलाओं की जो अपने पति की लत से परेशान रहती थीं।पटना, आलोक मिश्र। बिहार में बंद है शराब, फिर भी रंग में है शराब। खुलेआम मिलती नहीं, लेकिन चहेतों को निराश भी नहीं करती। बिहार सरकार पूरी तरह अंकुश लगाने के हर प्रयास करती है, फिर भी लेने वालों को मिल ही जाती है। किसी को सुरूर देती है तो किसी की जेब मोटी होती है। अक्सर बरामदगी के कारण भी चर्चा में रहती है शराब। रोकथाम के स्थानीय प्रयास सफल न हो पाने के कारण अब सप्लाई की जड़ों पर चोट करनी शुरू कर दी गई है। अगर वाकई जड़ें पूरी तरह कट जाएंगी, तभी अंकुश लग सकेगा, नहीं तो यूं ही मिलती रहेगी शराब।कोरोना में कई राज्यों की अर्थव्यवस्था को शराब ने ही सहारा दिया था। बिहार में भी यह अर्थव्यवस्था का कारक है। फर्क सिर्फ इतना है कि इससे राज्य की सरकार को तो कोई फायदा नहीं होता, लेकिन इसके धंधे में लगे लोगों को खूब होता है। सूबे की सीमाओं पर सख्ती के बावजूद चुपचाप भीतर चली आती है शराब और शहर-शहर बंट भी जाती है। पकड़ी गई शराब गवाह है कि शराबबंदी असरदार नहीं है। बिहार में पिछले साल करीब एक करोड़ लीटर से अधिक शराब पकड़ी गई। पिछले साल दिसंबर में ही राज्य में 7,111 जगहों पर छापेमारी की गई। इस दौरान 615 लोग पकड़े गए और 200 से अधिक वाहन जब्त हुए। जिस मकान-गोदाम या वाहन से शराब बरामद हो रही है, उसको नीलाम करने का आदेश है, लेकिन सप्लाई जारी है। हर मिनट 22 लीटर शराब की बरामदगी का आंकड़ा यही बताता है कि सीमाओं पर सख्ती चाहे जितनी दिखे, लेकिन उसमें कई छेद हैं। एक को ढंकने की कोशिश होती है तो दूसरा खुल जाता है।रविवार को पटना के महादेव स्थान स्थित गोदाम से भारी मात्र में बरामद शराब को ट्रक में लोड कराते उत्पाद टीम के सदस्य। जागरणसूबे के भीतर बरामदगी के बाद भी रोकथाम दिखती न देख अब पुलिस ने जड़ पर चोट करनी शुरू कर दी है। गत अक्टूबर में एक ट्रक शराब की बरामदगी के बाद उसका सिरा थामे पुलिस जा धमकी हरियाणा के पानीपत के एक शराब सप्लायर अजीत सिंह के पास। अजीत सिंह के आठ ठेके हैं, वह अपने लाइसेंस पर शराब लेता और ट्रकों से बिहार पहुंचाता था। बिहार के पांच जिलों में उसकी सप्लाई थी। गुरुवार को पुलिस उसको पानीपत से लेकर बिहार आई। इसके अलावा एक गोदाम से 61 हजार लीटर शराब बरामद होने एक टीम उत्तर प्रदेश के आगरा रवाना हो गई है। लेकिन यह धंधा केवल कुछ छापेमारी या गिरफ्तारी से नहीं रुकने वाला, जब तक इसकी रोकथाम में लगे लोग इसमें शामिल न हों।बिहार में यह आरोप आम है कि पुलिस की मिलीभगत से ही यह धंधा फल-फूल रहा है। बानगी के रूप में गुरुवार को ही एक थानाध्यक्ष, एक दारोगा और दो सिपाही सस्पेंड किए गए। उन्होंने नौ शराब की पेटी से लदी गाड़ी और दो तस्करों को छोड़ने के लिए पांच लाख रुपये मांगे थे। लेकिन दलाल से बातचीत का ऑडियो वायरल हो गया और तीनों नप गए। ऐसी खबरें आए दिन आती रहती हैं।शराब केवल नशा ही नहीं चढ़ाती, बीच-बीच में विपक्ष को मुद्दा भी देती है। कोरोना के समय जब कई राज्यों में दाम बढ़ा कर बेची गई शराब तो बिहार में भी कहा जाने लगा कि इसकी बिक्री शुरू होनी चाहिए। चुनाव आए तो कांग्रेस और राजद के साथ ही राजग के सहयोगी हम के जीतनराम मांझी तक इसकी समीक्षा पर जोर देने लगे। चुनाव बाद भी कांग्रेस के विधानमंडल दल के नेता अजीत शर्मा ने शराबबंदी खत्म करने की मांग की। तर्क यह कि शराब की बिक्री रुक भी नहीं रही और प्रदेश को राजस्व भी नहीं मिल रहा।आंकड़ों के आधार पर बहस करने वालों के अनुसार लगभग 12 हजार करोड़ रुपये की शराब बिहार में अवैध ढंग से बिक रही है और सरकार को लगभग चार-पांच हजार करोड़ रुपये के राजस्व से हाथ धोना पड़ रहा है, जिसकी भरपाई जनता पर कई सेस लगाकर की जा रही है। कमाई के चक्कर में तमाम पुलिस वालों का ध्यान शराब पर ज्यादा रहता है, अपराध की रोकथाम पर नहीं।[स्थानीय संपादक, बिहार]शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप
Source: Dainik Jagran February 06, 2021 04:07 UTC