सैकड़ों साल बाद भी यूएफओ को लेकर रहस्‍य बरकरार, विज्ञान और तकनीक का नया दौर - News Summed Up

सैकड़ों साल बाद भी यूएफओ को लेकर रहस्‍य बरकरार, विज्ञान और तकनीक का नया दौर


नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। बेशक देश में हर साल नेशनल साइंस कांग्रेस का आयोजन होता है, लेकिन सवाल यह है कि दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश बन रहे भारत के लिए क्‍या इतना ही पर्याप्‍त है? मानव जीवन को आसान बनाने वाली तकनीकों की खोज के लिए क्‍या सरकार, शैक्षणिक संस्‍थानों और यहां तक कि इंडस्‍ट्री तक को आगे आकर साइंस के प्रति रुचि बढ़ाने वाले आयोजनो को प्रोत्‍साहित करने की लगातार पहल नहीं करनी चाहिए? आखिर भारत जैसे देश में कितना जरूरी है विज्ञान और तकनीक को अधिक से अधिक बढ़ावा देना, बता रहे हैं अरुण श्रीवास्‍तव...पीकेकरीब चार साल पहले राजकुमार हिरानी की एक फिल्‍म आई थी ‘पीके’, जिसमें मुख्‍य भूमिका आमिर खान (पीके) और अनुष्‍का शर्मा (जग्‍गू) ने निभाई थी। इसमें पीके यानी आमिर खान को किसी दूसरे ग्रह से आए प्राणी के रूप में दिखाया गया है। धरती पर आने के बाद उसके यान को बुलाने वाला रिमोट चोरी हो जाता है और उसके बाद वह यहां रहते हुए इंसानी जीवन की झूठ-फरेब से दो-चार होता है। बाद में रिमोट मिल जाने पर वह अपने यान को बुलाकर वापस चला जाता है। दरअसल, सैकड़ों सालों से देश और दुनिया में उड़न तश्‍तरी (यूएफओ यानी अनआइडेंटिफाइड फ्लाइंग ऑब्‍जेक्‍ट) को देखे जाने की बातें की जाती रही हैं, लेकिन प्रामाणिक तौर पर आज तक इसकी पुष्‍टि नहीं हो सकी है। अभी भी यूएफओ को लेकर रहस्‍य बरकरार है। यहां तक कि अंतरिक्ष में पृथ्‍वी को छोड़कर चांद और मंगल सहित 116 प्‍लेनेट देखे जाने का दावा वैज्ञानिकों द्वारा किया जा चुका है, लेकिन अभी भी किसी ग्रह पर जीवन होने की खोज नहीं की जा सकी है।साइंस कांग्रेस में पहलयह अच्‍छी बात है कि जालंधर में आयोजित 106वीं इंडियन साइंस कांग्रेस में भारत सहित अमेरिका, जापान, चीन व कनाडा के वैज्ञानिकों ने दूसरे ग्रहों पर जीवन की खोज के लिए मिलकर अध्‍ययन करने का निर्णय लिया है। इसके लिए थर्टी मीटर टेलीस्‍कोप प्रोजेक्‍ट यानी टीएमटी भी तैयार किया जा रहा है। इसमें लगे 492 मिरर से धरती से सीधे अंतरिक्ष में स्‍थित ग्रहों की साफ तस्‍वीर ली जा सकेगी और फिर उसके अध्‍ययन के जरिए वहां जीवन की संभावनाओं की तलाश की जाएगी। साइंस कांग्रेस में सीएसआइआर, चंडीगढ़ के वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित और प्रदर्शित 3डी प्रिंटेड इंप्‍लांट तकनीक की सहायता से पैरालिसिस या दुर्घटना के शिकार मरीजों के अंगों की मूवमेंट व टूट-फूट को ठीक करने में कारगर मदद मिल सकेगी। साइंस कांग्रेस में इस तरह में विज्ञान और तकनीक पर आधारित कई अन्‍य चौंकाने वाले इनोवेशन पेश किए गए।जीवन में विज्ञान की जरूरतहाल के वर्षों में तकनीक के क्षेत्र में तरक्‍की तेज होने का फायदा हम इंसानों को खूब मिल रहा है। हालांकि इसके बावजूद अभी भी इस क्षेत्र में बहुत कुछ किया जाना बाकी है, ताकि इंसानी जीवन की मुश्‍किलें कम हो सकें और कृषि से लेकर चिकत्‍सा और आवागमन तक के मामले में सहूलियत हो सके। हमारे रोजमर्रा के जीवन में तकनीक की अहमियत बढ़ी है। इसे देखते हुए ही हर साल साइंस कांग्रेस का आयोजन किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि जब विज्ञान और तकनीक का हमारे जीवन में महत्‍व लगातार बढ़ रहा है, तो ऐसे में क्‍या साइंस को बढ़ावा देने वाले ऐसे आयोजन साल में सिर्फ एक बार ही होने चाहिए? विडंबना यह है कि हमारे देश में आज भी विज्ञान को लेकर बच्‍चों और बड़ों मे कोई खास दिलचस्‍पी नहीं देखी जाती। स्‍कूली स्‍तर पर संस्‍थानों और अध्‍यापकों द्वारा बच्‍चों को न तो विज्ञान में रुचि लेने के लिए प्रेरित करने का अधिक प्रयास किया जाता है और न ही इसके लिए समुचित प्रयोगशालाएं ही होती हैं। बेशक स्‍कूलों की संख्‍या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके सिर्फ व्‍यावसायिक पहलू ही देखे जा रहे हैं। सरकार और शिक्षण संस्‍थाओं तक किसी का भी सरोकार विज्ञान को लेकर उतना नहीं दिखता। इसी का नतीजा यह है कि बच्‍चों को जो पढ़ाया-बताया जा रहा है, वे वही ग्रहण करने को मजबूर हैं। चिंता यह भी है कि दूसरे देशों की तुलना में जरूरत होने के बावजूद आज भी हमें पर्याप्‍त संख्‍या में वैज्ञानिक नहीं मिल पा रहे हैं।जगाएं बच्‍चों की रुचिअब जबकि हम दुनिया का सबसे युवा देश बनने के द्वार पर खड़े हैं, तो क्‍या हमें तकनीक और प्रौद्योगिकी के मामले में आज भी अमेरिका, रूस, जर्मनी, जापान, चीन, ताइवान जैसे देशों से सबक लेते हुए अपने यहां साइंस को बढ़ावा देने का पुरजोर प्रयास नहीं करना चाहिए? इसके लिए केंद्र और राज्‍य सरकारों को संकल्‍प दिखाते हुए स्‍कूली स्‍तर से लेकर विश्‍वविद्यालय स्‍तर तक विज्ञान और तकनीक को प्रोत्‍साहित करने के लिए कारगर कदम उठाये जाने चाहिए। सिर्फ शोध/रिसर्च और बड़े संस्‍थानों पर ही ध्‍यान देने से बात नहीं बनने वाली। इसका बीज तो बिल्‍कुल प्रारंभिक अवस्‍था में यानी स्‍कूलों से ही बोने की शुरुआत की जानी चाहिए। स्‍कूलों में दिलचस्‍प/रोचक तरीके से खेल-खेल में छोटी उम्र से ही विज्ञान के प्रति रुझान पैदा किया जाना चाहिए, ताकि बड़े होने के साथ विज्ञान के प्रति उनकी उत्‍सुकता लगातार बढ़ती जाए। बड़े होकर यही बच्‍चे इसरो, डीआरडीओ, आइएआरआइ जैसे तमाम संस्‍थानों के कर्णधार बन सकते हैं। हो सकता है कि बड़ी संख्‍या में युवा वैज्ञानिक सामने आने पर सरकारों को ऐसे और कई संस्‍थान स्‍थापित करने पड़ें। अगर ऐसा होता है तो यह देश के तीव्र विकास के लिए ही फायदेमंद होगा। दुनिया में भारत और मजबूती से अपनी पहचान बनाएगा।विज्ञान प्रतियोगिताओं और ओलंपियाड को बढ़ावादूसरे देशों से सबक-सीख लेते हुए हमें स्‍कूली स्‍तर पर अधिक से अधिक विज्ञान प्रतियोगिताएं आयोजित करने की पहल करनी चाहिए। इसके अलावा, स्‍कूली बच्‍चों को दुनियाभर में होने वाले साइंस, गणित और अन्‍य प्रकार के ओलंपियाड में हिस्‍सा लेने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए सरकार और संस्‍थानों द्वारा उनके लिए हर तरह की मदद का भी प्रावधान किया जाना चाहिए।गार्जियन समझें रुझानदूसरों को देखकर, प्रभावित होकर अपने बच्‍चों


Source: Dainik Jagran January 07, 2019 05:26 UTC



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