कैथल, सुरेंद्र सैनी। नाम आशा यानी, उम्मीद है। संघर्ष कितना भी लंबा हो, मुश्किलें चाहे जितनी बड़ी हों, वह जीतेगी। 15 वर्ष पहले सिर से पिता का साया उठ गया। मां बीमार रहती है। आशा दूध बेचकर न केवल परिवार का सहयोग करती है, बल्कि जूडो में भी एक के बाद एक पदक जीत रही है। कैथल की आशा सैनी ने अब तक जिला, राज्य व नेशनल स्तर पर 24 पदक जीते हैं। इनमें 11 गोल्ड मेडल हैं। गरीबी के चलते उसे भर पेट खुराक तक नहीं मिलती। खेलने के लिए किट भी नहीं है, लेकिन जज्बा बरकरार है। उसने पढ़ाई की राह नहीं छोड़ी। बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा आशा का कहना है कि शिक्षा और खेल के माध्यम से कोई भी मंजिल हासिल की जा सकती है।दूध बेचकर जो पैसा मिलता है उसी से चल रहा घरआशा के तीन भाई व बहन हैं। बड़ी बहन की शादी हो चुकी है। भाई सबसे छोटा है। 15 साल पहले पिता की मौत के बाद परिवार में कमाने वाला कोई नहीं है। मां पहले दिहाड़ी कर परिवार का पालन-पोषण कर रही थी, लेकिन तीन-चार सालों से बीमारी के चलते घर पर ही रहती हैं। अब एक भैंस रखी हुई है। दूध बेचकर जो पैसा आता है, उसी से घर चल रहा है। इतने मेडल जीतने के बाद भी सरकार की तरफ से अब तक कोई सहयोग नहीं मिला है। यहां तक नेशनल में पदक जीतने के बाद भी खेल विभाग ने उसे राशि देना तो दूर की बात सम्मानित तक नहीं किया। आशा बताती है कि उसका सपना देश के लिए गोल्ड जीतने का है।स्टेट में गोल्ड व नेशनल में जीता कांस्यजूडो खिलाड़ी आशा सैनी ने बताया कि बचपन से ही खेलने का शौक था। शहर के राजकीय कन्या स्कूल में आठवीं कक्षा के दौरान ट्रायल के लिए कोच स्कूल में आए थे। चयन के बारे में मां दर्शना देवी को बताया तो मना कर दिया, लेकिन उसकी जिद को देखते हुए बड़ी बहन ने मां को मनाया तो मैदान में उतर गई। पहले जिला, फिर राज्य स्तर पर गोल्ड जीता। नेशनल स्तर पर भी रजत पदक जीत चुकी है। स्टेट में वर्ष 2017 में हिसार, इसी वर्ष भिवानी, वर्ष 2018 में कैथल व कुरूक्षेत्र में आयोजित राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में गोल्ड जीता। उत्तर प्रदेश में हुई जूनियर नेशनल गेम्स में कांस्य पदक जीता।Posted By: Sanjay Pokhriyal
Source: Dainik Jagran January 07, 2019 05:03 UTC