सवाल-जवाब : जान‍िए क्‍या होता है नवार्ण मंत्र और क्‍यों है यह इतना महत्‍वपूर्ण? - Others - News Summed Up

सवाल-जवाब : जान‍िए क्‍या होता है नवार्ण मंत्र और क्‍यों है यह इतना महत्‍वपूर्ण? - Others


सप्ताह का ज्ञान– वनस्पतियों और औषधियों का देवी से सीधा संबंध है। हरड़, शैलपुत्री का रूप हैं। (जो सात प्रकार की होती है। हरीतिका, पथया, कायस्थ, अमृता, हेमवती, चेतकी और श्रेयसी), ब्रह्मचारिणी का संबंध ब्राह्मी से, चंद्रघंटा का चंदुसूर से, कुष्माण्डा का पेठा (कद्दू) से, स्कंदमाता का अलसी से, कात्यायनी का मोइया अर्थात माचिका से, कालरात्रि का नागदौन (महायोगिनी, महायोगीश्वरी) से, महागौरी का तुलसी से (जिसके प्रकार हैं सफेद तुलसी, श्यामा तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र), तथा सिद्धिदात्री का शतावरी से सीधा संबंध माना गया है।टिप्‍स ऑफ द वीक– नवरात्रि पर देवी को ताजे पान पर लौंग, इलायची व सुपारी के साथ पर्याप्त मात्रा में मिष्ठान, मखाने और सिक्के अर्पित करें। मिष्ठान, मखाने और सिक्कों को छोटी कन्याओं में वितरित कर दें। आर्थिक लाभ होगा, ऐसा मान्यताएं कहती हैं।आपके भविष्य का आईना है आपके नाम का प्रथम अक्षर II नाम के लोग आकर्षक, स्पष्टवक्ता,कर्मठ और चतुर लोगों में शुमार होते हैं। ये अपने श्रम और लगन के बल पर आसमान छूने का दम रखते हैं। ये नित्य नया सीखने का प्रयास करते हैं। शिक्षा, कला और साहित्य की इन्हें गहरी समझ होती है। इनका मन कांच की तरह साफ होता है। साफगोई का इनका यही गुण कई बार इनके लिए मुसीबत का सबब बन जाता है। इनके भीतर लोगों को अपनी ओर खींचने की विशेष कला होती है। ये लोग कड़े श्रम के समर्थक होते हैं और मेहनत से न कभी पीछे भागते हैं, न ही श्रम से बचने वालों को पसंद करते हैं। आलस्य और आलसियों के ये धुरविरोधी होते हैं। ये किसी भी काम को देर तक टालना उन्हें सख्त नापसंद होता है। ये हर काम को अतिशीघ्र पूर्ण कर लेना चाहते हैं। ये एक अच्छे योजनाकार व रणनीतिकार होते हैं। किसी भी काम को ये बहुत सोच-विचार और नाप-जोख कर करना चाहते हैं। ये अपूर्ण ज्ञान को नापसंद करते हैं।प्रश्न: नवार्ण मंत्र क्या है? – मुकेश कुमारउत्तर: नवार्ण नव और अर्ण के युग्म से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है नौ अक्षर। ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाऐ विच्चे को नवार्ण मंत्र कहा गया है। इसके हर अक्षर हर अक्षर से शक्ति और ग्रहों का सीधा संबंध है। पहला अक्षर ऐं है, जो सूर्य ग्रह और शैलपुत्री से संबंधित है। दूसरा अक्षर ह्रीं है, जो चंद्रमा ग्रह और ब्रह्मचारिणी से नियंत्रित है। तीसरा अक्षर क्लीं, चतुर्थ चा, पंचम मुं, षष्ठ डा, सप्तम यै, अष्टम वि तथा नवम अक्षर चै है। जो क्रमशः मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु ग्रहों पर असर डालता है। इन अक्षरों से संबंधित ऊर्जाएं है, क्रमशः चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री। नवार्ण के तीन देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं तथा इसकी तीन देवियां महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती हैं।प्रश्न: देवी अंबा, दुर्गा और नौ अलग अलग देवियों में क्या फर्क है?-अजय माथुरउत्तर: सद्‌गुरुश्री कहते हैं कि नवरात्र की प्रत्येक रात्रि हमारी स्वयं की सुप्त आंतरिक क्षमताओं और ऊर्जाओं के विभिन्न पहलुओं को प्रकट करती है, जिसे मान्यताएं नौ प्रकार की शक्तियों या देवियों की संज्ञा देती है। शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री, ये किसी अन्य लोक में रहने वाली देवी या किसी पाषाण प्रतिमा के पूजन से पहले हममें ही विराजमान हमारी अपनी ही आंतरिक ऊर्जा के नौ विलक्षण स्वरूप हैं। दुर्गा हमारी दुर्गति को दूर करने की शक्ति का नाम है। अंबा शब्द ‘अम्म’ और ‘बा’ के युग्म से बना है। कुछ द्रविड़ भाषाओं में अम्म का अर्थ जल और बा का मतलब अग्नि से है। लिहाजा अंबा का शाब्दिक अर्थ बनता है, जल से उत्पन्न होने वाली अग्नि अर्थात् विद्युत। इसीलिए कहीं-कहीं नवरात्र को विद्युत की रात्रि यानि शक्ति की रात्रि भी कहा जाता है।प्रश्न: क्या नवरात्र में समृद्धि के लिए साधना की जा सकती है?-राकेश मिश्राउत्तर: सद्‌गुरुश्री कहते हैं कि नवरात्र बाहर बिखरी हुई अपनी ऊर्जा को स्वयं में आत्मसात करने यानी उन्हें खुद में समेटने का काल है और आंतरिक ऊर्जा से बड़ी कोई ऊर्जा नहीं है। इसीलिए स्वयं को पहचानना आवश्यक है। नवरात्र के प्रथम तीन दिन आत्म बोध और ज्ञान बोध के, तीन दिन शक्ति संकलन और उसके संचरण यानी फैलाव के और तीन दिन अर्थ प्राप्ति के कहे गए हैं। यूं तो नवरात्र में भी लक्ष्मी आराधना की जा सकती है, क्योंकि इसकी तीन रात्रि अर्थ, धन या भौतिक संसाधनों की भी कही गई हैं। सनद रहे कि धन प्राप्ति के सूत्र तो सिर्फ श्रमपूर्वक कर्म और स्वयं की योग्यता व क्षमता में ही निहित हैं।प्रश्न: नवरात्र में किया जाने वाला देवी पाठ क्या है? -पायल अग्रवालउत्तर: सद्‌गुरुश्री कहते हैं कि देवी पाठ या चंडीपाठ दरअसल ध्वनि के द्वारा अपने भीतर की ऊर्जा के विस्तार की एक पद्धति है। ये पाठ प्राचीन वैज्ञानिक ग्रंथ मार्कण्डेय पुराण के श्लोकों में गुंथे वो सात सौ वैज्ञानिक फॉर्म्युला हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वह अपने शब्द संयोजन की ध्वनि से हमारे अंदर की बदहाली और तिमिर को नष्ट करने वाली ऊर्जा को सक्रिय कर देने की योग्यता रखते हैं। ये कवच, अर्गला, कीलक, प्रधानिकम रहस्यम, वैकृतिकम रहस्यम और मूर्तिरहस्यम के छह आवरणों में लिपटे हुए हैं। इसके सात सौ मंत्रों में से हर मंत्र अपने चौदह अंगों में गुंथा है, जो इस प्रकार हैं- ऋषि, देवता, बीज, शक्ति, महाविद्या, गुण, ज्ञानेंद्रिय, रस, कर्मेंद्रिय स्वर, तत्व, कला, उत्कीलन और मुद्रा। माना जाता है कि संकल्प और न्यास के साथ इसके उच्चारण से हमारे अंदर एक रासायनिक परिवर्तन होता है, जो आत्मिक शक्ति और आत्मविश्वास को फलक पर पहुंचाने की योग्यता रखता है। मान्यताएं इसे अपनी आंतरिक ऊर्जा के विस्तार में उपयोगी मानती हैं।अगर, आप भी सद्गुरु स्वामी आनंद जी से अपने सवालों के जवाब जानना चाहते हैं या किसी समस्‍या का समाधान चाहते हैं तो अपनी जन्‍मतिथ‍ि, जन्‍म समय और जन्‍म स्‍था


Source: Navbharat Times October 18, 2020 05:26 UTC



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