'फुल, हाफ, साफ'.. नीतीश कुमार के तीन टर्म और डिक्शनरी से 3C की विदाई - News Summed Up

'फुल, हाफ, साफ'.. नीतीश कुमार के तीन टर्म और डिक्शनरी से 3C की विदाई


सड़कें बनी पर गड्ढे बाकी, बिजली मिली पर रेट पर रार नीतीश कुमार बार-बार रैलियों में दावा कर रहे हैं कि उन्होंने 2005 की तुलना में बजट आकार सातगुना दसगुना बढ़ाया है जो सही भी है। 2005 में 23 हजार 885 करोड़ रुपए का बजट था जबकि 2020 में दो लाख 501 करोड़ रुपए का बजट पेश किया गया। नीतीश ने जिस विका का दावा किया था उसके लिए बजट आकार बढ़ाना जरूरी था। पैसे का इंतजाम नीतीश सरकार ने वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक और राज्य के स्रोतों से की। शराब की लाइसेंसी दुकानें बढ़ाने से ही एक्साइज ड्यूटी में 5000 करोड़ रुपए मिलने लगे। जहां 2005 में 1,15000 किलोमीटर ग्रामीम सड़कों में 835 किलोमीटर सड़कें पक्की थीं, वहीं नीतीश काल के 15 साल में 95388 किलोमीटर सड़कें बनीं। इस दौरान 6046 पुल-पुलियों का निर्माण हुआ। अगर हाई-वे की बात करें तो 3826 किलोमीटर की लंबाई में सड़कें बनीं। हालांकि बिहार के हर इलाके में सड़कों की हालत एक जैसी नहीं है। जब हम सहरसा से मधेपुरा के लिए निकले तो एनएच-107 की हालत बेहद खराब थी। स्थानीय पत्रकार ने बताया कि इस पर 2018 में पटना हाई कोर्ट के एक जज ने खुद संज्ञान लिया था , पर उसके बाद भी सड़क गड्ढे में है। घर-घर बिजली के अभियान को नीतीश ने बखूबी पूरा किया। नीतीश के मंत्रियों ने दावा किया कि हर घर बिजली योजना से प्रभावित होकर ही नरेंद्र मोदी ने सौभाग्य योजना शुरू की। 2005 में जहां 700 मेगावाट बिजली मिलती थी, वहीं 2020 में 5932 मेगावाट बिजली की आपूर्ति होती है। खेती के लिए अलग से फीडर बनाए जा रहे हैं। चुनाव के ग्राउंड रिपोर्ट में हर जगह सड़क और बिजली पर नीतीश की तारीफ हुई। 2015 के चुनाव में नीतीश ने ऐलान कर दिया था कि अगर घर-घर बिजली नहीं पहुंचे तो वोट मत देना। पर बिजली नई समस्या लेकर आई है। बढ़े हुए बिल। शहरी इलाकों में 300 केवी से ज्यादा बिजली खपत पर प्रति यूनिट रेट 8.50 रुपए है जो उत्तर प्रदेश और दिल्ली से भी ज्यादा है।​विकास के दावों की सच्चाई के बीच गरीब होते बिहारी नीतीश ने सदर अस्पतालों की व्यवस्था दुरुस्त की और डॉक्टरों को समय पर सैलरी मिलने लगी। हालांकि सूबे में अभी भी 5000 डॉक्टरों के पोस्ट खाली हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। पिछले साल ही मुजफ्फरपुर में 100 से ज्यादा बच्चों की मौत इनसैफेलाइटिस से हो गई। हर जिले में मेडिकल कॉलेज की योजना परवान नहीं चढ़ रही है। प्राइवेट नर्सिंग होम और अस्पतालों की चांदी है। गरीबों के लिए इलाज की अच्छी व्यवस्था पीएमसीएच तक में नहीं है। सरकार के दावे जो भी हों पर मुफ्त दवाई का दावा भी जमीन पर खोखला है। नेशनल हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 24 हजार लोगों पर एक डॉक्टर है जबकि WHO के मुताबिक एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे का दावा है कि 21 हजार डॉक्टरों और पैरामेडिक्स की भर्तियां हुई हैं, बजट 2005 के 278 करोड़ से बढ़ कर 2020 में 11 हजार करोड़ रुपए हो गया। इस पांचगुना बढ़ोत्तरी का अपेक्षित फायदा आम लोगों को मिलता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। अब सवाल उठता है कि अगर बजट आकार विकास का पैमान है तो पूरे देश का बजट भी 1990 की तुलना में 2020 में लगभग बीसगुना बढ़ा है। राष्ट्रीय औसत से तुलान हो जाए। 11 हजार लोगों पर एक डॉक्टर की तुलना में बिहार में 24 हजार लोगों पर एक डॉक्टर है। बिहार में प्रति व्यक्ति आय 30,617 रुपए है जबकि राष्ट्रीय औसत 92 हजार रुपए का है। 38 जिलों में 13 को तो केंद्र सरकार ने पिछड़ा घोषित किया हुआ है। मैन्युफैक्चरिंग और फैक्ट्रियों की संख्या 2920 है और इसमें चार साल में कोई बदलाव नहीं हुआ है। सरप्लस बजट पेश करने वाली सरकार का 75 परसेंट रेवन्यू केंद्रीय करों में हिस्सेदारी और केंद्र सरकार के अनुदान से आता है जो देश में सबसे ज्यादा है। जीडीपी में राज्य सरकार के अपने करों का अनुपात 2015-16 के 6.8 परसेंट से घटकर 5.7 परसेंट रह गया है क्योंकि शराबबंदी से लगभग 5 हजार करोड़ रुएप का नुकसान हुआ है।​अंबानी और टाटा ने नीतीश के साथ नाश्ता किया निवेश नहीं बीजेपी से खटास के साथ 2010 की महाजीत के बाद नीतीश कुमार सतर्क हो गए। सारा श्रेय खुद को देने का मन बनाया और पहले ही आदेश से विधायकों का स्थानीय क्षेत्र विका फंड समाप्त कर दिया। तर्का था इससे लूट और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। मुख्यमंत्री के नाम पर ही योजनाओं की भरमार हो गई और बजट के बड़े हिस्सा नीतीश के दस्तखत से इस पर खर्च होता। मिसाल के लिए मुख्यमंत्री बालिका पोशाक योजना, मुख्यमंत्री कन्या सुरक्षा योजना, मुख्यमंत्री बालिका साइकल योजना, मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, मुख्यमंत्री रोजगार ऋण योजना, मुख्यमंत्री सेतु निर्माण योजना, मुख्यमंत्री लाडली-लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना ... और..और। नौकरशाह इन कार्यक्रमों को चला रहे थे। विधायकों का उन पर कोई अधिकार रहा , न दखल। लेकिन कुछ कल्याणकारी योजनाओं के आगे बिहार नहीं बढ़ रहा था। निवेश सिर्फ वादे तक सीमित रहा। नीतीश ने इसके लिए खुद मोर्चा संभाला। निवेशकों का सम्मलेन भी बुलाया। मुकेश अंबानी पटना आए, बीमार पड़े चीनी मिलों को फिर चालू करने के लिए 5 करोड़ का प्रोनोट लिखा और लौट गए। फिर पटना की तरफ मुड़ कर नहीं देखा। टाटा ग्रुप के रतन टाटा ने नीतीश के साथ नाश्ता किया, उद्योग लगाने की संभावना जताई और चले गए। फिर बिहार की याद नहीं आई। 2012 तक 96,754 करोड़ रुपए की 172 प्रस्तावित योजनाओं में से केवल 15 में महज 700 करोड़ रुपए का निवेश हो पाया। बिजली और सड़क बन जाने के बावजद मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लाने में नीतीश 2020 में भी सफल नहीं रहे। पलायन जारी रहा। इसका तरीका उन्होंने खोजा। वो कहने लगे बिहार लैंड लॉक्ड स्टेट है। इसलिए उद्योग नहीं लग रहे। यूपी, एमपी भी तो लैंड लॉक्ड ही हैं। राज्य सरकार ने ओडिशा में डेडिकेटेड पोर्ट मांगा , उस पर शायद काम चल ही रहा है। पर , अभी तक धरातल पर कुछ नहीं उतर सका। इसीलि


Source: Navbharat Times November 04, 2020 04:29 UTC



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