डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। क्षेत्रीय तनाव के बीच पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच शांति का मध्यस्थ बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है। इस्लामाबाद वाशिंगटन और तेहरान के बीच चल रहे संघर्ष को खत्म करने के लिए वार्ता की मेजबानी का प्रस्ताव दे रहा है, लेकिन इसके पीछे कूटनीतिक अवसर के साथ-साथ अपनी सुरक्षा चिंताएं भी प्रमुख हैं। विशेष रूप से सऊदी अरब के साथ हालिया रक्षा संधि अब पाकिस्तान के लिए बोझ बनती जा रही है।सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुई थी संधि एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तानी अधिकारी सऊदी अरब के साथ हुए म्यूचुअल डिफेंस पैक्ट को एक समस्या मान रहे हैं। पिछले साल (सितंबर 2025) साइन हुए इस समझौते में कहा गया था कि एक देश पर हमला दूसरे पर हमला माना जाएगा।लेकिन अब बढ़ते ईरान-सऊदी तनाव और हालिया ईरानी हमलों (जिसमें सऊदी अरब की धरती पर हमले शामिल हैं) के कारण पाकिस्तान को डर है कि उसे युद्ध में एक पक्ष चुनने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे वह बचना चाहता है।एक पाकिस्तानी सूत्र ने कहा कि सऊदी अरब के साथ समझौता हमारे लिए समस्या बनता जा रहा है। यह निवारक के रूप में नकद राशि देने के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन हमें कोई नया निवेश नहीं मिला और निवारक उपाय विफल होते दिख रहे हैं। पाकिस्तान को अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिले, जबकि क्षेत्रीय संघर्ष में फंसने का खतरा बढ़ गया है।पाकिस्तान की दोहरी रणनीति पाकिस्तान अमेरिका-ईरान संघर्ष (जो करीब एक महीने से चल रहा है) को शांत करने के लिए सक्रिय है। उसने अमेरिका का 15 सूत्रीय शांति प्रस्ताव ईरान तक पहुंचाया है और तेहरान के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए रखते हुए वाशिंगटन से भी संपर्क बनाए हुए है।
Source: Dainik Jagran March 28, 2026 17:56 UTC