नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। ईरान से अमेरिका की अदावत कोई नहीं है। दोनों देशों के बीच परमाणु संधि से पहले और संधि के टूटने के बाद के समय में कोई खास फर्क नहीं आया है। इतना की कहा जा सकता है कि संधि के कुछ समय दोनों देशों के बीच कोई तीखी बयानबाजी नहीं हुई। लेकिन, डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद दोनों के रिश्ते लगातार खराब ही हुए हैं। अब इन खराब होते रिश्तों पर ट्रंप ने यह कहते हुए एक और हमला किया है कि वह पश्चिम एशिया में में अपने विमानवाहक युद्धपोत और बमवर्षक विमान तैनात कर रहा है।दुनिया भर में इन जगहों पर तैना है यूएस बेड़ेयदि ऐसा हुआ तो पूरी दुनिया में मौजूद अमेरिकी सेना का ग्यारहवां बेड़ा होगा जो यहां पर तैनात होगा। इससे पहले उत्तरी अटलांटिक महासागर, प्रशांत महासागर में जिसका मुख्यालय सैन डियागो में है, दक्षिण अटलांटिक महासागर में तैनात बेड़े का मुख्यालय फ्लोरिडा में है, मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सेना का मुख्यालय बहरीन में है, इटली के गाएटा, पश्चिमी प्रशांत महासागर में तैनात बेड़े का मुख्यालय जापान के योकोशुका में है और मध्य अटलांटिक तट पर तैनात कर चुका है जिसको साइबर कमांड के नाम से जाना जाता है।चिंता का विषयलेकिन अमेरिकी बेड़े की पश्चिम एशिया में तैनाती की बात ईरान के लिए बड़ी चिंता का विषय है। दरअसल, अमेरिका ने इस इलाके में विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन और बमवर्षक टॉस्क फोर्स को तैनात करने का फैसला लिया है। सबसे बड़ी चिंता की बात ये भी है कि कहीं पश्चिम एशिया इसकी वजह से जंग का नया अखाड़ा न बन जाए। इस आशंका की वजह अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) जॉन बोल्टन की ईरान को दी गई वो चेतावनी है जिसमें उन्होंने कहा है कि यदि अमेरिकी हितों या उसके सहयोगी देशों के खिलाफ कोई हमला हुआ तो उसे भारी बल प्रयोग का सामना करना पड़ेगा।ईरान से परमाणु समझौता रदआपको बता दें कि पिछले साल 8 मई को अमेरिका ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को रद कर दिया था। हालांकि इस समझौते से जुड़े दूसरे देश अब भी ईरान के साथ हैं। लेंकिन अमेरिकी बेड़े की पश्चिम एशिया में तैनाती पर फिलहाल सभी चुप हैं। आपको बता दें कि अमेरिका ईरान को दुनिया में अलग-थलग करने की नीति पर काफी हद तक सफल हुआ है। वह भी तब जबकि यूरोपीय संघ के कई देश परमाणु करार रद करने पर अमेरिका के खिलाफ दिखाई दिए थे। अमेरिका ने ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हुए हैं। इसके अलावा तेल खरीद पर भी अमेरिका ने ईरान के हाथ काट दिए हैं।ईरान की अर्थव्यवस्था की टूट जाएगी कमरइतना ही नहीं भारत और चीन जो ईरान से तेल खरीद के सबसे बड़े खरीददार थे, को भी कोई राहत देने से इंकार कर दिया है। अमेरिका के इस फैसले का असर जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की पर भी पड़ेगा। इस फैसले के पीछे ट्रंप की मंशा ईरान की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ना है। आपको बता दें कि ईरान की कमाई का सबसे बड़ा जरिया कच्चा तेल ही है। ऐसे में यदि वह इस कारोबार से बाहर हो जाता है तो उसको दिवालिया होने से कोई रोक नहीं पाएगा।इनसे है ईरान का छत्तीस का आंकड़ाऐसे में ईरान के पास कोई भी विकल्प नहीं बचा है। ईरान की समस्या एक ये भी है कि सऊदी अरब और अमेरिका के बेहतर संबंध हैं और ईरान-सऊदी अरब में छत्तीस का आंकड़ा है। इसके अलावा परमाणु करार से अमेरिका के बाहर होने के बाद ट्रंप ने पिछले माह ही ईरान के विशिष्ट बल रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को विदेशी आतंकी संगठन घोषित किया था। इसके जवाब में ईरान ने भी अमेरिकी सेना को इसी तरह का दर्जा दिया था।रमजान: पाकिस्तान में ब्रेड से लेकर मीट तक सभी कुछ हुआ महंगा, 7वें आसमान पर पहुंची कीमतेंअमेरिका दिखा रहा आंख! चीन है परेशान तो भारत की भी बढ़ी हुई है चिंताएस्ट्रॉयड के खतरे में अफ्रीका से अमेरिका, खत्म कर सकता है पूरा महाद्वीपभारत के पास मौजूद हैं 11 Guided Missile Destroyer, जिनकी आहट से ही कांप उठता है दुश्मनलोकसभा चुनाव और क्रिकेट से संबंधित अपडेट पाने के लिए डाउनलोड करें जागरण एपPosted By: Kamal Verma
Source: Dainik Jagran May 07, 2019 11:15 UTC