अध्यात्म की राह पर चलकर ही प्राप्‍त कर सकते हैं यह लक्ष्‍य - News Summed Up

अध्यात्म की राह पर चलकर ही प्राप्‍त कर सकते हैं यह लक्ष्‍य


संजय तेवतियाभोगवादी प्रवृत्ति और सोच व्यक्ति को अनैतिक और अमानवीय बना देती है। इसमें लिप्त होकर व्यक्ति मानवीय मूल्य और संवेदनाओं को भूल जाता है। साथ ही यह भी भूल जाता है कि उसके लिए क्या नुकसानदायक है और क्या फायदेमंद। ऐसा मनुष्य सिद्धांतहीन और चरमपंथी हो जाता है। वह अपनी इस प्रवृत्ति की खातिर दूसरे को किसी भी हद तक कष्ट दे सकता है और क्रूर हो जाता है। पुराने समय में राजा, महाराजा विलासितापूर्ण जीवन जीते थे। उनके लिए अपनी प्रजा का कोई महत्व नहीं होता था, निरीह प्राणियों का आखेट करने में उन्हें आनंद आता था। छोटी-छोटी गलतियों पर प्रजा को कठोर दंड देना, जैसे कोड़े लगवाना, जेल में डाल देना, फांसी लगवाना उनके लिए सामान्य बात होती थी। इस तरह की सजा देकर ही वे प्रजा में अपना डर बनाकर रखते थे।गीता के कर्मों के सिद्धांत के अनुसार हम जो कुछ करते हैं, वे हमारे कर्मों के खाते में जमा होते रहते हैं। अनैतिक कर्मों का फल अवश्य मिलता है। अक्सर लोगों को कहते सुना गया है कि बेकसूर लोग क्यों झेलते हैं? परंतु ऐसा नहीं होता है। जाने-अनजाने में सबके किए गए अच्छे-बुरे कर्मों का नतीजा बाद में सामने आता है। अपनी भोग, लिप्सा शांत करने के लिए मनुष्य दुर्लभ जीव-जंतुओं को इस ब्रह्मांड से बेदखल करने के निर्मम अभियान में न जाने कब से लगा है। यह सब पर्यावरण संतुलन से कहीं ज्यादा दया और करुणा का मुद्दा है।अहिंसा, संयम, मितव्ययिता जैसे मानवीय गुण आज के चरम भोगवादी समाज में अप्रासंगिक भले मालूम पड़ते हों, पर मानवता और दुनिया की बेहतरी के लिए ये विचार बेहतर हैं। हालांकि इन पर अमल करने वालों की संख्या बहुत ही कम रह गई है। योगी परमहंस के अनुसार भोग एक संस्कृत का शब्द है जिसका मतलब तुष्टि, विलासिता, उपभोग, सांसारिक अनुभव और इंद्रिय सुख या दैहिक आनंद होता है। योगिक दर्शन के अनुसार आस्वादन को कुछ लोग सांसारिक सुख के रूप में देखते हैं जो इंसान को आत्मबोध से दूर करता है। दूसरे लोग इसे बिना लगाव के मजे के रूप में देखते हैं और मानते हैं कि यह स्वस्थ मन, मस्तिष्क और शरीर के लिए आवश्यक है।भगवद्गीता के अनुसार जिन लोगों का मस्तिष्क दैहिक खुशी के आस्वादन की चिंता और भोग विलासिता से जुड़ा होता है, वैसे व्यक्ति अपनी बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल अपनी आय को बढ़ाने, सांसारिक अधिकार पाने और मौज-मस्ती के लिए करते रहते हैं। इस तरह के मार्ग पर चलने वालों को भगवत प्राप्ति के लिए दृढ़ संकल्प लेना होता है। अध्यात्म ही एकमात्र ऐसा मार्ग है जो व्यक्ति को सांसारिक विलासिता से बचाता है और प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर ले जाता है। यहीं पर असली और स्थायी खुशी मिलती है। व्यक्ति एक बार जब इस मार्ग पर चल पड़ता है, फिर उसे लौटने की इच्छा नहीं होती है क्योंकि यह सच्चा मार्ग है, इसका पता उसे चल जाता है।हमारे सबसे पुराने धर्मग्रंथ वेदों के अनुसार मानव जीवन और मानवता के मुख्य उद्देश्य के रूप में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन किया गया है। व्यक्ति को उपभोग की सचाई को समझना चाहिए। जैसे योग एक शुभ दिन की तरह होता है उसी प्रकार मौज-मस्ती एक काली रात की तरह होती है। उसी प्रकार आध्यात्मिक दुनिया एक शुभ दिन है जबकि भोग-विलास की दुनिया एक काली रात के समान है।


Source: Navbharat Times January 28, 2021 05:48 UTC



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