Two brave Iranian women share a life of oppression, Fariba Nazemi, Masih Alinejad - News Summed Up

Two brave Iranian women share a life of oppression, Fariba Nazemi, Masih Alinejad


Hindi NewsInternationalTwo Brave Iranian Women Share A Life Of Oppression, Fariba Nazemi, Masih Alinejadदो जांबाज ईरानी महिलाओं ने साझा किया दमन का दौर: न झुकीं, न डरीं; ईरान में अपने हक के लिए महिलाओं की जंग 47 साल से जारी हैतेहरान 3 घंटे पहलेकॉपी लिंकमहिला अधिकार एक्टिविस्ट का कहना है कि ईरान में अनिवार्य हिजाब सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि महिलाओं के दमन का प्रतीक है।ईरानी महिला अधिकार एक्टिविस्ट मसीह अलीनेजाद कहती हैं- ईरान में जारी युद्ध और संघर्ष पर हमें दर्द भी है और उम्मीद भी। मैं नहीं चाहती कि किसी निर्दोष नागरिक को नुकसान पहुंचे। ईरानी लोगों का संदेश है कि हमें इस घायल और खूंखार शासन के भरोसे अकेला न छोड़ें। इस काम को पूरा करें (शासन परिवर्तन), वरना ये लोग निहत्थे मासूमों से बदला लेंगे। यह ईरान के लिए ‘बर्लिन की दीवार’ गिरने जैसा पल है।ईरान की ‘मॉरैलिटी पुलिस’ के डीएनए में ही महिलाओं को पीटना शामिल है। अनिवार्य हिजाब सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि महिलाओं के दमन का प्रतीक है। अगर हम इस दीवार को गिरा देते हैं, तो यह कट्टरपंथी शासन खत्म हो जाएगा। मैं हिजाब के खिलाफ नहीं हूं, बल्कि ‘जबरदस्ती’ के खिलाफ हूं। महिलाओं को चुनने का हक होना चाहिए।निडर हैं ईरानी महिलाएंमुझे 1994 में 18 की उम्र में सरकार विरोधी पर्चे बांटने पर गिरफ्तार किया गया था। 2007 में देश छोड़ना पड़ा। 2014 में मैंने ‘माई स्टेल्थी फ्रीडम’ नाम से फेसबुक पेज शुरू किया, जहां ईरानी महिलाएं बिना हिजाब और अपने संघर्ष की तस्वीरें निडर होकर साझा करती हैं।80% ईरानी बदलाव चाहते हैं। इस्लामी गणराज्य ने हमसे सब कुछ छीन लिया है, सिवाय उम्मीद के। संसद की 299 सीटों में से 9 पर ही महिलाएं हैं और वे भी शासन की समर्थक हैं, न कि महिलाओं की रक्षक। इस बार शासन के खिलाफ प्रदर्शनों में मध्यम वर्ग और छात्र शामिल हैं। वर्तमान बदलाव उम्मीद जगाता है। सिर्फ मैं ही नहीं, ज्यादातर ईरानी खुश हैं। इस शासन ने मेरे लोगों को मारा और फांसी पर लटकाया है।ईरान में लोग खुशी से नाच रहे थे और उन प्रियजनों की कब्रों पर गए, जिन्हें शासन ने मार दिया था। मेरी दो बहनें, जिन्हें शासन ने अंधा कर दिया था, वे भी सड़कों पर खुशी से झूम उठीं। मैं और मेरी जैसी लाखों महिलाएं न झुकीं और न ही डरीं। संघर्ष जारी है और रहेगा।मसीह अलीनेजाद, ईरानी महिला अधिकार एक्टिविस्टपहले दिन से विरोधईरानी एक्टिविस्ट और आर्टिस्ट फरीबा नजेमी कहती हैं- ईरान में इस्लामी क्रांति के पहले महिलाएं स्वतंत्र थीं। 1979 से ही अनिवार्य हिजाब के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गया था। 2017 में एक महिला ने सफेद दुपट्टा लहराकर विरोध दर्ज किया तो 2022 में ‘वुमन लाइफ फ्रीडम’ में महिलाएं सड़कों उतरीं। हकों की यह लड़ाई जारी रहेगी।क्रांति से पहले ईरान की पहचान धर्म के आधार पर तय नहीं होती थी। अधिकतर लोग खुद को सबसे पहले मुसलमान के रूप में पेश नहीं करते थे। समाज खुला था और जीवन शैली में विविधता थी, लेकिन 47 साल पहले 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद समाज पर शरीयत कानून लागू कर दिया गया। उस समय मैं बहुत युवा थी और कट्टरपंथियों के उभार से खुश नहीं थी, हालांकि समाज के एक हिस्से ने नई व्यवस्था को स्वीकार भी कर लिया था।फरीबा नजेमी, ईरानी एक्टिविस्ट और आर्टिस्टसबसे अधिक असर महिलाओं पर पड़ा है। एक समय ऐसा था जब विश्वविद्यालयों में लगभग 66% छात्राएं थीं, लेकिन धीरे-धीरे अवसर कम हो गए। रोजगार में भी रुकावटें आईं। अब तो अगर किसी महिला के सिर पर डाले गए दुपट्टे से बाल का एक हिस्सा भी दिख जाए तो उसे परेशान किया जाता है या हिरासत में ले लिया जाता है। महिलाओं को रोका जाता है, धक्का दिया जाता है, पीटा जाता है या जबरन वैन में बैठाकर ले जाया जाता है।गश्त-ए-इरशाद जैसे संगठन सड़कों पर गश्त करते हैं और ड्रेस कोड के उल्लंघन पर महिलाओं को गिरफ्तार कर सकते हैं। हिरासत में लेते समय सुरक्षा गार्ड महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, युवा लड़कियों को ही निशाना बनाया जाता है। कानून महिलाओं की निजी जिंदगी पर भी पाबंदियां लगाता है। कानून इस तरह बनाए गए हैं कि वे महिलाओं को तलाक लेने से हतोत्साहित करते हैं। विदेश यात्रा के लिए भी महिलाओं को पति की अनुमति चाहिए होती है। अब यह हालात बदलने चाहिए।.


Source: Dainik Bhaskar March 08, 2026 08:45 UTC



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