हालांकि, यह सफर आसान नहीं था। भाई-बहन को भारी नुकसान भी झेलना पड़ा। शुरुआत में गर्मी के कारण 20% बीज खराब हो गए। तकनीकी गलतियों की वजह से दूसरे साल पैदावार थोड़ी कम रही। हालांकि, इन गलतियों से सीखते हुए अब वे भारत के अन्य राज्यों में अपने पार्टनर नेटवर्क के जरिए 8-15 किलो केसर का उत्पादन करने का टारगेट रख रहे हैं। उनका मकसद सिर्फ केसर का उत्पादन नहीं है। इसके बजाय भारत को बीज उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना है। वे चाहते हैं कि उपभोक्ताओं को मिलावटी केसर की जगह लैब-टेस्टेड शुद्ध कश्मीरी केसर उपलब्ध कराई जाए।भाई-बहन ने 630 वर्ग फीट के बंद कमरे में एयरोपोनिक्स (बिना मिट्टी की खेती) तकनीक का इस्तेमाल किया। इस तरीके में पौधों की जड़ों को हवा में लटकाया जाता है। उन पर पोषक तत्वों की धुंध (मिस्ट) छिड़की जाती है। उन्होंने सीखा कि तापमान को कैसे 3 डिग्री सेल्सियस से 27 डिग्री सेल्सियस के बीच मेनटेन करना है। साथ ही नमी को 30%- 80% के बीच किस तरह से कंट्रोल में रखना है। करीब चार साल की डीप रिसर्च और ईरानी वैज्ञानिकों से ऑनलाइन ट्रेनिंग लेने के बाद उन्होंने 2024-25 के पहले सीजन में 1.3 किलो प्रीमियम केसर का उत्पादन किया।आस्तिका और शंकर लुधियाना के रहने वाले हैं। उनका परिवार पारंपरिक रूप से खेती से जुड़ा नहीं रहा है। उनके पिता विकास नरुला एक बैंकर हैं। यूपीएससी में असफल होने के बाद आस्तिका आगे कुछ करने के बारे में सोच रही थीं। इस बीच शंकर ने बीसीए की पढ़ाई पूरी कर ली थी। उसी समय दोनों को वक्त मिला। उन्होंने अपने पिता के 'इनडोर फार्मिंग' के आइडिया को हकीकत में बदलने का फैसला किया। दोनों ने कश्मीर से बीज (कॉर्म्स) खरीदे। चिलर सिस्टम, एलईडी लाइट्स और वर्टिकल रैक्स का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया। इसका मकसद था लुधियाना की गर्मी में केसर के लिए जरूरी कश्मीर जैसी ठंड का माहौल बनाना।
Source: Navbharat Times April 06, 2026 01:39 UTC