दोबारा खड़े होने के इस सफर में राकेश बी. पाल ने किसी भी काम को छोटा नहीं समझा। उन्होंने फूड डिलीवरी की। बाइक टैक्सी चलाई। यहां तक कि जिम में फर्श और टॉयलेट तक साफ किए। आज चार साल के कड़े संघर्ष के बाद वह बेंगलुरु में अपना इलेक्ट्रिक ऑटो चलाते हैं। खाली समय में पेंटिंग और डांस जैसे अपने शौक पूरे करते हैं। ऐपल के ऑफिस से बेंगलुरु की सड़कों तक का यह सफर साबित करता है कि असली आजादी ऊंचे पद में नहीं है। इसके बजाय अपनी पसंद का काम करने और मानसिक शांति के साथ जीने में है।राकेश की चुनौतियां सिर्फ दफ्तर तक सीमित नहीं थीं। उनके पारिवारिक और वैवाहिक जिंदगी के तनाव ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया था। हालात इतने बिगड़ गए कि उन्हें निमहंस (NIMHANS) जैसे अस्पतालों में इलाज कराना पड़ा। वह लंबे समय तक एंटी-डिप्रेसेंट दवाओं पर निर्भर रहे। घंटों एक जगह बैठकर एक ही चीज पर सोचते रहते थे। उन्होंने खुद को घर की चारदीवारी में कैद कर लिया था। यह उनकी जिंदगी का सबसे अंधकारमय दौर था। सुख-सुविधाएं तो जरूर थीं। पर, मन में शांति का नामोनिशान नहीं था।
Source: Navbharat Times April 05, 2026 13:07 UTC