नसबंदी के बाद भी 4 बच्चों की मां प्रेग्नेंट:जयपुर 14 घंटे पहले लेखक: विक्रम सिंह सोलंकीफाइल फोटो।राजस्थान में नसबंदी कराने के बाद पांचवीं संतान होने का मामला सामने आया है। दरअसल, महिला ने चार बच्चे होने के बाद नसबंदी करा ली थी। दो साल के बाद नसबंदी फेल हो गई और वह गर्भवती हो गई।. चार बडे़ बच्चे होने के बाद पांचवीं संतान गर्भ में होने के कारण उसे काफी बदनामी का सामना करना पड़ा। महिला नसबंदी वाले अस्पताल पहुंची।आरोप है कि अस्पताल वालों ने जांच के बाद उसे बताया कि गर्भ में जुड़वा बच्चे हैं, जिनमें एक संक्रमित हो गया है। उस पर सफाई कराने का दबाव बनाया। हॉस्पिटल के खिलाफ महिला कोर्ट में पहुंच गई।पढ़िए पूरी रिपोर्ट…बीकानेर निवासी महिला के 4 बच्चे थे। दो बेटे, दो बेटियां। पति दिव्यांग थे। मजदूरी करते थे। आर्थिक स्थिति कमजोर थी। ऐसे में महिला ने चौथे बच्चे के जन्म के बाद बीकानेर के अस्पताल में नसबंदी का ऑपरेशन करा लिया।अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद 1 जुलाई 2015 को सर्टिफिकेट भी जारी कर दिया गया। दो साल के बाद 2017 में अचानक उसके पीरियड्स मिस हो गए।नसबंदी करा रखी थी, ऐसे में उसने ध्यान नहीं दिया। पीरियड्स लगातार मिस हुए तो चेकअप कराने का फैसला किया। अब तक आस पड़ोस की महिलाओं को भी पता चल गया था। वे भी उसका मजाक उड़ाने लगी। ताने मारने लगीं।6 मार्च 2017 को वह चेकअप कराने अस्पताल पहुंची। उसने पीरियड्स मिस होने और जी मिचलाने की बात की। महिला का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने पहले तो साफ मना कर दिया था।अस्पताल का दावा था कि ऐसा संभव ही नहीं है कि नसबंदी के बाद महिला गर्भवती हो जाए।अस्पताल की रिपोर्ट में महिला के जुड़वा बच्चे होने की संभावना जताई।जांच रिपोर्ट में जुड़वा बच्चे बताएमहिला और उसके घरवालों के दबाव डालने पर डॉक्टरों ने किट से टेस्ट कराया। रिपोर्ट में प्रेग्नेंसी की पुष्टि हो गई। इसके बाद सोनोग्राफी कराई। सोनोग्राफी में गर्भ में जुड़वा बच्चे होना सामने आया। ये जानकर महिला घबरा गई।महिला का आरोप है कि अस्पताल स्टाफ ने उससे कहा कि वह जल्दी ऑपरेशन कराकर सफाई करवा लें। एक बच्चा संक्रमित हो गया है। जल्दी ऑपरेशन नहीं कराया तो महिला की जान को भी खतरा हो सकता है।ये बात सुनकर वह बेसुध हो गई। रिपोर्ट लेकर वापस घर पर आ गई। महिला का आरोप है कि ऑपरेशन कराने की बात को लेकर कई बार अस्पताल ने दबाव बनाया गया।महिला ने ऑपरेशन नहीं कराया। उसे अस्पताल पर भरोसा नहीं था। महिला का आरोप है कि अस्पताल ने उसे कुछ रुपए देने का भी लालच दिया गया, लेकिन वह नहीं मानी।अल्ट्रासाउंड में भी महिला के गर्भ में जुड़वा बच्चे होने की बात कही गई।सरकारी अस्पताल की जांच में 1 ही बच्चा बतायामहिला ने इसके बाद बीकानेर के पीबीएम सरकारी अस्पताल में चेकअप कराया। वहां सोनोग्राफी में पता चला कि उसके गर्भ में एक ही बच्चा है और बिल्कुल स्वस्थ है। मां को भी कोई दिक्कत नहीं है। ऐसे में महिला ने बच्चे को जन्म देने का फैसला लिया।18 अक्टूबर 2017 को महिला ने पीबीएम अस्पताल में पांचवीं संतान को जन्म दिया। बच्चा बिल्कुल स्वस्थ था। कुछ दिनों बाद महिला ने तय किया कि वह अस्पताल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कराएगी।उसने सीनियर एडवोकेट अनिल सोनी से संपर्क किया। उन्होंने अस्पताल को एक लीगल नोटिस भेजा। अस्पताल की ओर से नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया गया।सीनियर एडवोकेट अनिल सोनी ने बताया कि महिला आर्थिक परेशानी के कारण डिप्रेशन में थी। गरीबी के कारण बच्चों को पालने में सक्षम नहीं थी। महिला ने कोर्ट में पांचवें बच्चे के जन्म होने पर हर्जाना दिलाने की मांग की।महिला ने पांचवें बच्चे के प्रसव पर खर्च के रूप में 50 हजार रुपए, बच्चे के बालिग होने तक 20 हजार रुपए, असहनीय क्षतिपूर्ति के लिए दो लाख रुपए, शारीरिक व मानसिक परेशानी के लिए एक लाख रुपए, कोर्ट फीस के रुप में 5 हजार रुपए मांगे थे।अस्पताल का दावा : इलाज नि:शुल्क हुआकोर्ट में अस्पताल की ओर दलीलों में कहा गया कि परिवादी का इलाज नि:शुल्क किया गया था। राज्य सरकार के नियमों के तहत उसे नसबंदी के एक हजार रुपए भी दिए गए थे।कई बार नसबंदी फेल हो जाती है। इस बारे में महिला को बता दिया था। नसबंदी पूर्णत सुरक्षित और सफल नहीं रहती है। महिला ने चेकअप के बाद बच्चे को जन्म देने का फैसला किया था।महिला को सफाई कराने के बारे में बताया गया था। ऐसे में बच्चे का जन्म होने पर अस्पताल की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है।नसबंदी के बाद प्रेग्नेंट होने से महिला तनाव में आ गई। ऐसे में अस्पताल के खिलाफ वह कोर्ट चली गई।फैलो रिंग कैसे लूज हुई, पता नहींकोर्ट में अस्पताल की ओर से बताया गया कि नसबंदी के दौरान फैलो रिंग लगाई गई थी। डिस्चार्ज तथा फॉलोअप कार्ड परिवादी को दिया गया था।इसमें बताया गया था कि कई बार ऑपरेशन फेल होने की आशंका रहती है। ऐसी स्थिति में माहवारी सामान्य तरीके से नहीं होने पर अस्पताल में संपर्क करने को कहा था।दोनों पक्षों की दलील सुनने पर कोर्ट ने कहा कि फैलो रिंग कैसे लूज हुई ये जांच का विषय है। फैलो रिंग ढीली होने या खुलने पर नसबंदी फेल होने से अस्पताल को दोषी नहीं माना जा सकता है।महिला डॉक्टरों की लापरवाही होने की बात को सही से सिद्ध नहीं कर सकी है। इसमें डॉक्टरों की लापरवाही नहीं मान सकते है। नसबंदी के बाद फिर से महिला के गर्भवती होने की संभावना रहती है। ऐसे में किसी विशेष चिकित्सक से भी राय मंगवाने का कोई औचित्य नहीं है।कोर्ट बोला : सरकार करे पीड़िता की मददउच्चतम न्यायालय ने फैसले में अस्पताल के विरूद्ध परिवाद खारिज करते हुए कहा कि राज्य सरकार पॉलिसी के अनुसार परिवादी को सहायता राशि दें। अगर सरकार ने किसी बीमा कंपनी से बीमा संविदा की हुई है तो बीमा क्लेम राशि दिलाई जाए।परिवादी अनपढ़ है। नसबंदी के बाद पांचवीं संतान को जन्म दिया है। अत: क्लेम पेश करने में देरी होने पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर परिवाद में समय नष्ट होने की अवधि को भी एडजस्ट करें।पीड़ित महिला का कहना है क
Source: Dainik Bhaskar March 19, 2026 12:19 UTC