देश की राजधानी दिल्ली सुरक्षित रहे इसके लिए भारत अमेरिका से नैशनल अडवांस्ड सरफेस टु एयर मिसाइल सिस्टम- II ( NASAMS-II ) हासिल करने के बेहद करीब है। भारत इसका उपयोग स्वदेशी, रूसी और इजरायल प्रणालियों के साथ मिलाकर एक बहुस्तरीय हवाई ढाल बनाने के लिए करेगा। अगर ऐसा हो जाता है तो राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को मिसाइल खतरों से ही नहीं, बल्कि ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल से भी सुरक्षित रखा जा सकेगा। इसका मतलब साफ है कि दिल्ली में 9/11 जैसे हमले लगभग नामुमकिन हो जाएंगे।रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि अमेरिका के अपने विदेशी सैन्य बिक्री कार्यक्रम, जिसकी 6,000 करोड़ रुपये (लगभग 1 बिलियन डॉलर) से अधिक की लागत है, के तहत भारत को NASAMS-II की बिक्री के लिए 'स्वीकृति का पत्र' का अंतिम मसौदा जुलाई-अगस्त तक भेजने की संभावना है। एक सूत्र के अनुसार, 'दिल्ली के आसपास मिसाइल बैटरियों की तैनाती के लिए साइटों के चयन पर कई बार बात हो चुकी है। एक बार सौदा तय हो जाने के बाद डिलीवरी दो से चार साल में हो जाएगी। रक्षा मंत्रालय (MoD) ने पहले NASAMS अधिग्रहण के लिए आवश्यक स्वीकृति प्रदान कर दी थी, जिसके बाद भारत ने अमेरिका को औपचारिक पत्र जारी किया था।अमेरिका हालांकि भारत पर अपने टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (THAAD) और पैट्रियट अडवांस्ड कैपेबिलिटी (PAC-3) मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी खरीदने पर विचार करने के लिए दबाव बढ़ा रहा है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने इस बारे में कहा कि $5.43 बिलियन (लगभग 40,000 करोड़ रुपये) उन्नत एस -400 ट्रायम्फ सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली के पांच स्क्वॉड्रन के लिए रूस के साथ सौदा पहले ही किया जा चुका है।भारत ने अक्टूबर, 2018 में चार साल की व्यापक वार्ताओं और अंतर-सरकारी समझौते के बावजूद CAATSA (अमेरिका के प्रतिबंध अधिनियम) नामक अमेरिकी कानून के तहत प्रतिबंधों के खतरे के बाद रूस के साथ एस-400 सौदा किया। एक अन्य सूत्र ने बताया, 'दरअसल, अमेरिकी THAAD रूसी एस-400 के साथ तुलना करने योग्य नहीं है। वह एस-400 ही है, जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करता है।'हालांकि, तेज तर्रार NASAMS को विशेष रूप से दिल्ली पर मिसाइल शील्ड (मिसाइल हमले से सुरक्षा) के लिए खरीदा जा रहा है। वहीं, एस-400 सिस्टम, जो अक्टूबर 2020-अप्रैल 2023 के बीच भारत को मिलनी है। एस-400 सिस्टम 380 किमी की सीमा में बम, जेट्स, जासूसी विमान, मिसाइल और ड्रोन का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने में सक्षम है। दिल्ली की सुरक्षा की सबसे बड़ी परत NASAMS के माध्यम से होगी। यह स्टिंगर सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, बंदूक प्रणालियों और AIM-120C-7 AMRAAMs (मध्यम दूरी क मिसाइल) जैसे विभिन्न हथियारों का एक संयोजन होगा, जो तीन-आयामी सेंटिनल रेडार पर आधारित होगा। यह नेटवर्क प्रणाली, इमारतों के आसपास भी शूटिंग करने में सक्षम है। इससे 9/11 जैसे बेहद करीबी हमलों से भी बेहद आसानी से बचा जा सकेगा।दिल्ली की 'मिसाइल शील्ड' की सबसे बाहरी परत डीआरडीओ द्वारा विकसित की जा रही स्वदेशी दो स्तरीय बलिस्टिक मिसाइल रक्षा (बीएमडी) प्रणाली द्वारा की जाएगी। इस प्रणाली की AAD (उन्नत वायु रक्षा) और PAD (पृथ्वी वायु रक्षा) इंटरसेप्टर मिसाइलों को वर्तमान में दुश्मन की मिसाइलों को रोकने के लिए तैयार किया गया है, जो 15-25 किमी से 80-100 किमी की ऊंचाई से 2,000 किलोमीटर की दूरी तक टारगेट को खत्म करने में सक्षम है।सुरक्षा की दूसरी परत उच्च स्वचालित और मोबाइल एस -400 सिस्टम के माध्यम से होगी, जिसमें 120, 200, 250 और 380 किमी की अंतर-दूरी वाली मिसाइलें होंगी। ये मिसाइलें रेडार, लॉन्चर्स सहित कई खूबियों से लैस होंगी। इसके बाद बराक-8 (मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली) संयुक्त रूप से इजरायल की ऐरोस्पेस इंडस्ट्रीज और डीआरडीओ का नंबर आएगा, जिसमें 70-100 किमी की इंटरसेप्शन रेंज होती है। 25 किलोमीटर की रेंज वाली स्वदेशी आकाश क्षेत्र की रक्षा मिसाइल प्रणाली, NASAMs के ऊपर परत बनाएगी।
Source: Navbharat Times June 10, 2019 00:59 UTC