Poonam.Gaur@timesgroup.com\Bनई दिल्ली :\B ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से शीतलहर और लू दोनों का प्रकोप बढ़ रहा ह। लेकिन जिंदगी के लिए शीतलहर अधिक घातक है। आईएमडी के अनुसार लू से कहीं अधिक लोग शीतलहर का शिकार होते हैं। पिछले 38 सालों के दौरान लू की वजह से कम जबकि शीतलहर से काफी अधिक लोगों ने अपनी जान गंवानी पड़ी। आईएमडी के 1980 से 2018 तक के लू और शीतलहर के दौरान हुई मौतों का आंकलन करते हुए यह दावा किया है। पिछले 16 दिनों से पूरे उत्तर भारत में शीतलहर का जबर्दस्त प्रकोप बना हुआ है। आईएमडी के आंकड़ों के अनुसार 1990 में लू की बजाय शीत लहर में जान गवानें वालों की संख्या 41 गुना तक अधिक थी। जबकि 2010 और 2018 के बीच ट्रेंड में कुछ बदलाव नजर आए। इस दौरान शीतलहर की वजह से मरने वालों की संख्या 4506 रही जबकि लू की वजह से 5572 लोगों ने अपनी जान गवांई। हालांकि इस दौरान भी 2011 अकेला ऐसा साल रहा था जब शीत लहर की वजह से मरने वालों की तादाद लू की तुलना में 60 गुना तक अधिक थी। जबकि 2018 इसके विपरीत साबित हुआ। 2018 में शीत लहर की वजह से 136 मौतें हुईं जबकि लू की चपेट में 16 लोगों ने जान गंवाई।हिंदूराव अस्पताल के मेडिसन डिपार्टमेंट के डॉ. डी के दास ने बताया कि लू में हीट स्ट्रोक और डीहाइड्रेशन की बीमारी अधिक होती हैं। इनका समय पर इलाज हो जाए तो यह जानलेवा नहीं होती। लेकिन शीतलहर में हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक और हाइपोथर्मिया बीमारी जानलेवा होती हैं। इसके अलावा बुजुर्गों में निमोनिया की बीमारी जानलेवा है। यही वजह है कि शीतलहर अधिक घातक है।साल लू में हुई मौतें शीतलहर में हुई मौतें2009 216 792010 242 4502011 12 7222018 16 136
Source: Navbharat Times December 30, 2019 02:26 UTC