15 अगस्त 1917 को चंपारण आए थे बापू: कस्तूरबा गांधी के साथ सिरौना की चुल्हिया ने जलाई थी शिक्षा की अलख, गरीब बच्चों को दी जाती थी शिक्षा - News Summed Up

15 अगस्त 1917 को चंपारण आए थे बापू: कस्तूरबा गांधी के साथ सिरौना की चुल्हिया ने जलाई थी शिक्षा की अलख, गरीब बच्चों को दी जाती थी शिक्षा


Hindi NewsLocalBiharMotihari Sirauna Village Freedom Fighter Chulahi Devi; Bihar Mahatama Gandhi Motihari; Bihar Bhaskar Latest News15 अगस्त 1917 को चंपारण आए थे बापू: कस्तूरबा गांधी के साथ सिरौना की चुल्हिया ने जलाई थी शिक्षा की अलख, गरीब बच्चों को दी जाती थी शिक्षापटना 11 घंटे पहलेकॉपी लिंक15 अप्रैल 1917 को चंपारण में महात्मा गांधी का आगमन हुआ।पूर्वी चंपारण जिले के सिरौना गांव की रहने वाली मजदूर चुल्हिया की प्रेरणा से महात्मा गांधी ने एक नई शिक्षा प्रणाली की शुरूआत की थी, जिसे बुनियादी शिक्षा के नाम से जाना गया। वाक्या उन दिनों का है, जब चंपारण के किसानों पर नीलहें अंग्रेजों का कहर चरम पर था। चंपारण के जागरूक किसान बाबू लोमराज सिंह व पं. राजकुमार शुक्ल के अथक प्रयास से चंपारण के किसान उत्पीड़न का जायजा लेने 15 अप्रैल 1917 को चंपारण में महात्मा गांधी का आगमन हुआ।सिरौना गांव में चुल्हिया से हुई मुलाकातगांधीजी ने अपने साथियों के साथ चंपारण के कोने-कोने से किसानों का बयान लेने का निर्णय लिया। जिसमें उनकी धर्मपत्नी कस्तूरबा गांधी का भी नाम था। 24 अप्रैल 1917 को मोतिहारी से करीब 30 किलोमीटर पर स्थित सिरौना गांव में कस्तूरबा जी पहुंची। यहां उनकी मुलाकात चुल्हिया नाम की मजदूर से हुई। उसी की झोपड़ी के पास कुएं पर उन्होंने ग्रामीण महिलाओं की चौपाल लगाई और उस चुल्हिया के गंदे बालों से ढ़ील हेरने लगी।देखते- ही- देखते चुल्हिया की चटाई पर गांव के नंग-धड़ंग बच्चे भी जमा होने लगे। कस्तूरबा जी ने उन बच्चों की पढ़ाई कराने के लिए चुल्हिया से कहा। उस पर चुल्हिया ने कहा था कि "हमारे परिवार के सभी सदस्य अपने एक आदमी की कमाई जो सेर भर अनाज है, उसी पर जिंदा रहते हैं। उन्होंने गांव में ही स्कूल खुलवाने की मांग की।आजादी से पहले हुई थी स्थापना।बुनियादी विद्यालय के लिए कस्तूरबा गांधी ने दिया प्रतिवेदनगांधीजी के पास प्रतिवेदन जमा होने लगे थे तो कस्तूरबाजी ने सिरौना की चुल्हिया के साथ हुई बातचीत पर आधारित अपना प्रतिवेदन समर्पित किया। इसमें उन्होंने बताया कि यहां की प्रजा के दुखों का एकमात्र कारण अनपढ़ होना है। आजादी की लड़ाई के साथ-साथ उन्हें शिक्षित करने की आवश्यकता है। अन्यथा अंग्रेजों की गुलामी के संकट से आजाद होने पर भी ये किसी दूसरे तरह के संकट में फंस जाएंगे।गांधीजी ने इसे प्राथमिकता दी और कोठीवाले साहब सहित जिला कलक्टर से भी सिरौना में स्कूल खोलने के लिए जमीन की मांग की। परंतु जमीन नहीं मिलने के कारण बेतिया राज की सीर कब्जेवाले क्षेत्र बड़हरवा लखनसेन में वहां के किसान बाबू शिवगुलाम लाल के बंगले में देश का प्रथम बुनियादी विद्यालय खोलने का काम किया। इस विद्यालय को चलाने के लिए उन्होंने अपने मित्र बबन भाई गोखले तथा उनकी पत्नी अवंतिका बाई गोखले एवं अपने कनिष्ठ पुत्र देवदास गांधी को जिम्मा दिया। यह विद्यालय 13 नवंबर 1917 को खोला गया। उसके बाद भितिहरवा में तथा मधुबन में बुनियादी विद्यालय की स्थापना की गई।इस क्षेत्र में रहा गांधीजी का प्रभावसिरौना गांव में कस्तूरबा गांधीजी का आगमन व चुल्हिया के विचारों से सहमत होकर पास के गांव बड़हरवा में बुनियादी विद्यालय की स्थापना से इस क्षेत्र में गांधीजी का पूरा प्रभाव रहा। इस बुनियादी विद्यालय में चरखा, कतली बागवानी, खेती, बढ़ाईगिरी, चर्मकारी व हस्तकरघा का काम शुरू किया गया। यह संदेश दिया गया कि भारतीय शिक्षा की यह नई प्रणाली रोजगारोन्मुखी होगी। जिससे गरीब के बच्चों को पढ़ने- लिखने के समय हीं अपने-अपने रूचि के अनुसार हूनर भी प्राप्त होगा।उपेक्षा का शिकार है कस्तूरबा गांधी सेवाश्रमराष्ट्रीय शिक्षा जागृति अभियान के अध्यक्ष व प्रसिद्ध शिक्षाविद रत्नेश्वरी शर्मा ने बताया कि बड़हरवा लखनसेन, भितिहरवा एवं मधुबन में चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में कार्यक्रमों की धूम मची रही। लेकिन बुनियादी शिक्षा को जन्म देनेवाली चुल्हिया के गांव और स्वतंत्रता सेनानियों की नगरी में कस्तूरबा गांधी एवं चुल्हिया के वार्तालाप स्थल पर अवस्थित कस्तूरबा गांधी सेवाश्रम आज तक उपेक्षित रह गया है। विश्व स्वतंत्रता सेनानी परिषद ने कस्तूरबा ग्राम सिरौना को गांधी सर्किट से जोड़ने की मांग उठाई है।श्रीबाबू को थी बड़हरवा लखनसेन देखने की इच्छाजब डा. श्रीकृष्ण सिंह बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने बड़हरवा लखनसेन व सिरौना गांव की चर्चा सुन वहां आने तथा उस स्थान को देखने की इच्छा जाहिर की। इसके बाद उनके समय मधुबन विधायक बने बृजबिहारी शर्मा ने सिरौना गांव के स्वतंत्रता सेनानियों से यह बात बताई। सभी इस बात से बहुत खुश हुए और उनके आगमन की तैयारी में इस गांव और क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों ने कस्तूरबा गांधी की अधूरी इच्छा को पूरा करने के लिए सन् 1959 में उच्च विद्यालय खोलने का निश्चय किया।जिसका उद्घाटन डा. श्रीकृष्ण सिंह ने करने की अनुमति दी। परन्तु इसी बीच श्रीबाबू का स्वर्गवास दिनांक 31 जनवरी 1961 को हो गया। इस कारण वे सिरौना नहीं आ सके। परन्तु वह विद्यालय आज इंटर स्तरीय राजकीयकृत विद्यालय के रूप में कस्तूरबा गांधी की स्मृति को उजागर कर रहा है। जहां सिरौना गांव तथा आसपास की बेटियां इंटर स्तर की शिक्षा अपने घर पर रहकर पूरी कर रही है।


Source: Dainik Bhaskar August 15, 2021 06:42 UTC



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