होर्मुज संकट: खाना और पानी खत्म... समुद्र में फंसे 20000 नाविक, SOS मैसेज से भरी हेल्पलाइन - News Summed Up

होर्मुज संकट: खाना और पानी खत्म... समुद्र में फंसे 20000 नाविक, SOS मैसेज से भरी हेल्पलाइन


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने एक बड़ा मानवीय संकट खड़ा कर दिया है। करीब 2000 जहाजों पर सवार 20,000 से ज्यादा नाविक समुद्र में फंसे हुए हैं, जहां उनके पास खाने-पीने जैसी जरूरी चीजें भी कम पड़ने लगी हैं।यह स्थिति ऐसे समय में बनी है, जब युद्ध अपने पांचवें हफ्ते में पहुंच चुका है और ईरान की धमकियों के कारण इस अहम समुद्री रास्ते पर आवाजाही लगभग ठप हो गई है। नाविकों की मुश्किलें सिर्फ नाकेबंदी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जटिल समुद्री कानून भी उन्हें जहाज छोड़कर निकलने से रोक रहे हैं।मदद के लिए लगातार आ रही गुहार समाचार एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक, नाविकों की मदद के लिए बनी हेल्पलाइन पर लगातार संदेश और कॉल आ रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय परिवहन श्रमिक संघ के सपोर्ट टीम को भेजे गए संदेशों में खाने, पानी और जरूरी सामान की तुरंत जरूरत बताई गई है।आईटीएफ के नेटवर्क कोऑर्डिनेटर मोहम्मद अर्राचेडी ने कहा कि स्थिति बेहद गंभीर है और नाविकों में डर का माहौल है। उन्होंने बताया कि उन्हें देर रात तक नाविकों के फोन आते हैं, जो इंटरनेट मिलते ही मदद की गुहार लगाते हैं। एक नाविक ने घबराहट में कहा कि "हम यहां बमबारी के बीच फंसे हैं, हम मरना नहीं चाहते, हमें यहां से निकालिए।"क्यों जहाज छोड़ नहीं पा रहे नाविक? संघर्ष शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस क्षेत्र को युद्ध क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। ऐसे में नियमों के मुताबिक, नाविकों को वापस भेजने और दोगुनी सैलरी देने का प्रावधान है।लेकिन कई जहाज ऐसे हैं, जहां ये नियम लागू नहीं होते। एक नाविक ने ईमेल में शिकायत की कि जहाज का ऑपरेटर उनकी सुरक्षा की चिंता को नजरअंदाज कर रहा है और उन्हें जबरन काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इस वजह से कई नाविकों के पास जहाज पर रहने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।कम वेतन के कारण मजबूरी में काम आईटीएफ की टीम के सदस्य लूसियन क्राचिउन के मुताबिक, उन्हें मिलने वाले करीब आधे ईमेल वेतन से जुड़े होते हैं। कई नाविक कम कमाई के कारण खतरे के बावजूद जहाज नहीं छोड़ पा रहे हैं।एक नाविक ने पूछा कि क्या युद्ध क्षेत्र में होने के कारण उसकी 16 डॉलर रोज की सैलरी बढ़कर 32 डॉलर हो जाएगी। इससे साफ है कि कई जहाजों पर काम करने वालों को बेहद कम वेतन मिलता है। ऐसे मामलों में श्रमिक समझौते भी नहीं होते, जिससे नाविकों की सुरक्षा और अधिकार दोनों खतरे में पड़ जाते हैं।आधुनिक शिपिंग व्यवस्था में एक जहाज कई देशों से जुड़ा होता है किसी एक देश का मालिक, दूसरे में रजिस्ट्रेशन और तीसरे द्वारा संचालन। सामान्य स्थिति में यह व्यवस्था व्यापार को आसान बनाती है, लेकिन संकट के समय यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि नाविकों की जिम्मेदारी किसकी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, नाविकों की सुरक्षित वापसी के लिए कई देशों और कंपनियों के बीच तालमेल जरूरी है, जो फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है।


Source: Dainik Jagran April 01, 2026 12:30 UTC



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