मौत के मुंह से लौटकर बेटे के लिए जिंदा रहीं, दूसरों को भी दिया सहारा- नीतू सिंह ।बचपन में भाई की दर्दनाक मौत, मां के मानसिक ट्रॉमें, परिवार के बिखराव और आर्थिक तंगी ने कम उम्र में ही मोना बलानी को जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा दिया।पति और खुद के एचआईवी पॉजिटिव होने का झटका, पति और छोटे बेटे को खोने का गम, इलाज के दौरान अपमान और सामाजिक बहिष्कार, फिर खुद टीबी से मौत के मुंह तक पहुंचना ... यह सब किसी को भी तोड़ सकता था। लेकिन मोना बलानी टूटी नहीं। वह हजारों एचआईवी संक्रमित महिलाओं, बच्चों और वंचितों की उम्मीद बन गईं। दर्द से सेवा का जीवंत प्रतीक बनीं।बचपन के हादसे का परिवार पर असरराजस्थान के जयपुर में मेरा जन्म हुआ। हम 4 भाई-बहन थे। मैं 12 साल की थी, तो छोटे भाई की पतंग उड़ाते हुए छत से गिरकर मृत्यु हो गई। भाई की दर्दनाक मौत से मां टूट गईं। वह मानसिक अवसाद में चली गईं। मां की देखभाल पापा करते थे, उनकी हलवाई की दुकान भाइयों ने संभाली। वे दोनों नशा करने लगे। काम में नुकसान होने पर कर्ज लिया। पापा की सेहत भी बिगड़ने लगी। एक समय पढ़ाई के लिए किताबें भी नहीं खरीद पा रही थी।प्रेम विवाह किया, तो घर से नाता टूटाघर के क्लेश से दूर मुझे अपने दोस्त के साथ सुकून मिलता था। हम महारानी कॉलेज में साथ पढ़ते थे। मैंने 1993 में उन्हीं से शादी का फैसला किया। उस समय मैं सिर्फ 18 साल की थी। घरवालों को यह मंजूर नहीं था क्योंकि हमारी जाति अलग थी। घरवालों ने सारे रिश्ते तोड़ दिए, लेकिन हम अपनी दुनिया में खुश थे। माता-पिता ने 10 साल तक मेरे पति की शक्ल तक नहीं देखी।दोनों एचआईवी पॉजिटिव, संक्रमित ब्लड से कहरः
Source: Dainik Bhaskar January 31, 2026 06:45 UTC