संकलन: हफीज किदवईएक बार हजरत निजामुद्दीन और अमीर खुसरो शाम को छत पर टहल रहे थे। यूं टहलते हुए अपने शिष्यों को जीवन के सबक देना हजरत निजामुद्दीन का शगल था। टहलते-टहलते यह लोग छत पर एक किनारे की ओर आए तो उसी वक्त यमुना किनारे से योगियों का एक जत्था अपनी ही धुन में गाता-बजाता निकल रहा था। हजरत निजामुद्दीन ने उन योगियों को अपने ईश्वर की आराधना में मस्त होकर जाते देखा, तो एकदम से उनके मुंह से निकला, ‘हर कौम रास्त राहे, दीन-औ किबला गाहे’, यानि, हर कौम का अपना ईश्वर और उस ईश्वर को पाने के रास्ते हैं।पहली बार जगन्नाथ यात्रा में रथ नहीं खींच सकेंगे भक्त, ऐसे होंगे दर्शनउस शाम छत पर टहलते हुए हजरत निजामुद्दीन ने खुसरो को सबक दिया कि हर मजहब ईश्वर तक जाता है। इसलिए जब भी सबको देखो, तो बराबरी से ही देखो। न किसी कौम को कमतर आंको और न ही उनके ईश्वर को। बल्कि उनको तो अपने से भी बेहतर मानो, तभी जिंदगी का फलसफा सीख सकते हो। उस शाम यह सबक सीखने के कुछ दिन बाद खुसरो गयासुद्दीन तुगलक के साथ बंगाल के युद्ध में चले गए। अभी वे बंगाल में ही थे कि उन्हें अपने महबूब-ए-इलाही के जन्नतनशीं होने की खबर मिली। खबर मिलते ही वे भागे-भागे वापस दिल्ली पहुंचे।इन राशियों के लिए खुशखबरी लेकर आ रहा है यह सप्ताह, होगा प्रमोशनदिल्ली पहुंचने पर सबसे पहले खुसरो ने अपना सब कुछ उन्हीं योगियों और गरीबों में बांट दिया। फिर वे हजरत निजामुद्दीन की कब्र पर काला कपड़ा पहनकर बैठ गए। उनकी याद में आंसू बहाते-बहाते अमीर खुसरो ने यह कलाम भी पढ़ा, ‘गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस, चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहुं देस।’ अपने पीर के वियोग में खुसरो यही कलाम कहते जाते और रोते जाते। छह महीने तक खुसरो अपने महबूब-ए-इलाही के वियोग में रोते रहे, और आखिरकार वहीं उनकी कब्र के बगल आकर हमेशा के लिए सो गए।
Source: Navbharat Times June 10, 2020 02:48 UTC