मिलिए उस लद्दाखी पोर्टर से जो सियाचिन में जवानों की जान बचा चुका है! - News Summed Up

मिलिए उस लद्दाखी पोर्टर से जो सियाचिन में जवानों की जान बचा चुका है!


हमारे देश की रक्षा करने के लिए 22,000 फीट की ऊंचाई पर जहां तापमान -40 डिग्री तक गिर जाता है… जी हां सियाचिन, वहां पर हमारे सैनिक तैनात हैं। रोज वो एक नई दिक्कत का सामना करते हैं, उससे जूझते हैं। यहां कुछ लोकल लोगों को सेना में बतौर पोर्टर (यानी सामान उठाने वाले) के तौर पर काम दिया जाता है। वो सैनिकों के लिए जरूरत का सामान लादकर पोस्ट तक पहुंचाते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं 31 वर्षीय Stanzin Padma की कहानी, जिन्होंने दो भारतीय जवानों की जान बचाई है।मिला है जीवन रक्षक पदकपद्मा को सैनिकों की जान बचाने के लिए गृह मंत्रालय द्वारा ‘जीवन रक्षक पदक’ से भी सम्मानित किया जा चुका है। साल 2014 में उन्हें ये पदक मिला था। हाल ही में उन्होंने ‘द बैटर इंडिया’ के साथ अपनी कहानी शेयर की। वो उन पांच लोगों की टीम का हिस्सा थे जिसमें थे दो जवान बर्फ के तूफान के हुए हिमस्खलन के नीचे दब गए थे। ये टाइगर एलपी पोस्ट की बात है। ये पोस्ट 21,500 फीट की ऊंचाई पर है। साल 2013 में एक रात में पांच सैनिक हिमस्खलन के नीचे दब गए थे।‘हम सब हिमस्खलन के नीचे थे’Stanzin Padma :Gama in the land of Lama Stanzin Padma, a porter of Indian Army at Siachen glacier, is the first… Posted by Sanket Kulkarni on Wednesday, February 19, 2014वो कहते हैं, ‘हम पांच थे। हमारे साथ इंडियन आर्मी के एक ऑफिसर भी थे। हम सब रेस्क्यू क्रू का हिस्सा थे। पहले हमने स्नो स्कूटर निकाले लेकिन मौसम ज्यादा खराब था। हम उन्हें चला नहीं सकते थे। फिर हम पैदल निकल पड़े। जैसे ही निकले वैसे ही हिमस्खलन हो गया और हम सब उसके नीचे दब गए।’‘मैं बर्फ में जम चुका था’वो कहते हैं, ‘मैं बर्फ में जम चुका था। मैंने महसूस किया कि मेरा शरीर बिलकुल भी नहीं हिल पा रहा है। हमारा एक साथी कमर तक फंसा था। वो बाहर निकल गया, उसने ही हमें सबको रेस्क्यू किया। फिर हमने अपनी पोस्ट में वापस जाने का सोचा। मौसम बहुत खराब था और हम डर भी चुके थे। इसके बाद जिनकी हालत खराब थी उन्हें तुरंत नीचे आते ही अस्पताल भेजा गया।’इतने रुपये मिलते हैं काम करने केपद्मा जैसे कई पोर्टर सेना की ऐसे मदद करते हैं। वो लोकल होते हैं। पद्मा ने बताया कि अधिक से अधिक उन्हें 857 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं। ये उनका चार्ज है जो हाई पोस्ट पर तैनात होते हैं। जो बेस कैंप पर होते हैं, उन्हें 694 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं और साल 2017 से ये रकम ना बढ़ी है ना ही घटी है।90 दिन करते हैं कामये पोर्टर्स 90 दिनों तक लगातार काम करते हैं। इस दौरान मौसम की मार, हिमस्खलन, बर्फ के तूफान, बर्फ का खिसकना तमाम तरह की दिक्कतें झेलते हुए ये सेना की पोस्ट तक सामान पहुंचाते हैं। 90 दिनों बाद उन्हें नीचे आना होता है। फिर उनका मेडिकल चेकअप होता है और वो फिर से वापस जा सकते हैं। पद्मा लगभग 10 वर्षों तक पोर्टर का काम कर चुके हैं। अब वो एक ट्रेकिंग एजेंसी के साथ काम करते हैं। पद्मा जैसे कई पोर्टर हमारी सेना में काम करते हैं। हम उन सबको सलाम करते हैं।


Source: Navbharat Times November 19, 2020 04:58 UTC



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