मंगल पर मिलीं झीलों में है जीवन? भारतीय वैज्ञानिक की रिसर्च में छिपे हैं अहम जवाब - News Summed Up

मंगल पर मिलीं झीलों में है जीवन? भारतीय वैज्ञानिक की रिसर्च में छिपे हैं अहम जवाब


धरती पर 'जीवन' की खोज डॉ. राम करन ने इस जीव में एक एंजाइम 'लैक्टेज' (बीटा-गैलेक्टोसिडेस) की खोज की है। उन्होंने इसकी बनावट के बारे में भी विस्तार से बताया है। यह तो अभी मालूम नहीं है कि मंगल ग्रह के वातावरण में जीवन उपस्थित है या नहीं लेकिन नासा और अन्य देशों के अभियान इस बात का पता लगाने का कार्य कर रहे हैं। साल 2017 में Proceedings of the National Academy of Sciences of the United States of America में लिखे उनके एक पेपर में अंटार्कटिक के सूक्ष्मजीवी की चर्चा की गई थी। इसमें बताया गया था कि बैक्टीरिया के जीवन का मॉलिक्यूलर आधार मंगल पर जीवन और हमारी आकाशगंगा में दूसरे ग्रहों की खोज जैसा है।​मंगल पर झीलों का मिलना, जीवन की खोज की दिशा में कितनी बड़ी उपलब्धि है? एक जाहिर सा सवाल है कि क्या मंगल की झीलों या तालाबों से जीवन को मदद मिल सकती है? ताजा स्टडी में इस बात के संकेत मिले हैं कि मंगल पर सतह के पास मौजूद माने जा रहे नमकीन पानी में ऑक्सिजन की इतनी मात्रा हो सकती है जिससे extremophiles की शक्ल में माइक्रोबियल जीवन को आधार मिल सके। इससे स्टडी से मंगल पर जीवन की संभावना को बल मिला है। अंटार्कटिक डीप लेक (Antarctic Deep Lake) धरती पर सबसे ठंडा और सबसे एक्सट्रीम जलीय पर्यावरण है। मंगल से समानता के चलते मरीन बायॉलजिस्ट्स और ऐस्ट्रोबायॉलजिस्ट के लिए डीप लेक आकर्षण का केंद्र रहा है। यह लेक कभी जमती नहीं है। यहां तक कि -20 डिग्री सेल्सियस से नीचे के तापमान में भी यह जमती नहीं क्योंकि यहां नमक बहुत ज्यादा है। मंगल के जमे हुए ध्रुव पर नमकीन पानी की खोज extremophiles की स्टडी से समान है। उनकी रिसर्च में मंगल पर जीवन के लिए जरूरी प्रोटीन्स के खास फीचर सामने आए हैं। भविष्य में जब वैज्ञानिक मंगल के नमक के सैंपल्स को जीवन की खोज के लिए स्टडी करेंगे, वे धरती पर पाए जाने वाले जीवन में इसकी समानता खोजेंगे। ऐसे में डॉ. रामकरण को जापान के फुकुओका और इटली में सर्वोत्कृष्ट युवा वैज्ञानिक पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। 35 देशों के 150 वैज्ञानिक प्रतिभागियों के बीच प्रतिद्वंद्विता में उनके शोध को पुरस्कृत किया गया। फिलहाल वह दुनिया को औद्योगिक प्रदूषण से मुक्त करने की दिशा में शोध कर रहे हैं। अमेरिकी सरकार ने उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका में रिसर्च फेलोशिप के लिए चयनित किया जो एशिया के 48 देशों में से सिर्फ एक वैज्ञानिक को मिलती है।


Source: Navbharat Times November 15, 2020 12:00 UTC



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