डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद पाकिस्तान की सरकार पर घरेलू और कूटनीतिक दबाव बढ़ गया है। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की खुलकर प्रशंसा अब राजनीतिक विवाद का कारण बनती दिख रही है।उस समय शरीफ ने ट्रंप को पश्चिम एशिया में लाखों लोगों की जान बचाने और कई युद्ध रोकने का श्रेय देते हुए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करने की बात कही थी। अब जब अमेरिका और इजरायल ईरान पर लगातार हमले कर रहे हैं, तो शरीफ के पुराने बयान इंटरनेट मीडिया पर फिर वायरल हो गए हैं। पाकिस्तान में कई राजनीतिक और धार्मिक समूह सरकार की अमेरिका से नजदीकी पर सवाल उठा रहे हैं।पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन राजधानी इस्लामाबाद और अन्य शहरों में हुए विरोध प्रदर्शनों में सैकड़ों लोगों ने ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पोस्टर जलाए। प्रदर्शनकारियों ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के समर्थन में भी नारे लगाए, जिनकी फरवरी के अंत में अमेरिकी-इजरायली हमलों में मौत हो गई थी।बीते सप्ताह पाकिस्तान में हुए विरोध प्रदर्शनों में कम से कम 26 लोगों की मौत की खबर है। कराची स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास की ओर बढ़ती भीड़ पर गोलीबारी में 11 प्रदर्शनकारी मारे गए। मुश्किल में फंसा पाकिस्तान विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान एक कठिन संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। एक ओर उसकी ईरान से लंबी सीमा और धार्मिक संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर खाड़ी देशों और अमेरिका के साथ आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते भी अहम हैं। पाकिस्तान को हर साल मिलने वाली लगभग 40 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा में से आधे से अधिक खाड़ी देशों से आने वाली रकम का हिस्सा है।पूर्व राजदूत मलीहा लोदी के अनुसार अमेरिका के खिलाफ गुस्सा केवल शिया समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक राष्ट्रीय भावना बन चुका है। पाकिस्तान की लगभग 15-20 प्रतिशत आबादी शिया मुस्लिम है, जो ईरान के प्रति सहानुभूति रखती है।इसी बीच पाकिस्तान की सेना प्रमुख जनरल सैयद आसिम मुनीर ने सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान से मुलाकात कर क्षेत्रीय सुरक्षा पर चर्चा की। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पिछले वर्ष हुए पारस्परिक रक्षा समझौते के तहत किसी एक पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा।
Source: Dainik Jagran March 08, 2026 16:34 UTC