पढ़ें- देश-दुनिया को हिला देने वाली यह स्टोरी, जब दुष्कर्म के बाद हुआ था एक छात्रा का कत्ल - News Summed Up

पढ़ें- देश-दुनिया को हिला देने वाली यह स्टोरी, जब दुष्कर्म के बाद हुआ था एक छात्रा का कत्ल


नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। 20वीं सदी के अंतिम दशक (1990-2000) के दौरान देश की राजधानी दिल्ली में हुए तीन बड़े मर्डर (नैना साहनी (2 जुलाई, 1995), प्रियदर्शनी मट्टू (23 जनवरी, 1996) और जेसिका लाल (30 अप्रैल, 1999)) ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। ठीक 24 साल पहले 23 जनवरी, 1996 को दिल्ली विश्वविद्ययालय की लॉ की छात्रा प्रियदर्शिनी का सिर्फ मर्डर ही नहीं हुआ था, बल्कि उसके साथ दुष्कर्म जैसी दरिंदगी भी हुई थी। आज वह जिंदा होती तो संभवतया कि देश की जानी-मानी वकील होती, लेकिन हत्या को लेकर चले 3 साल तक चले मुकदमे में निचली अदालत ने हत्यारोपित संतोष कुमार सिंह को बरी कर दिया था। इसके बाद कोर्ट में कुल मिलाकर यह मामला 14 साल तक चला। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मुख्य आरोपी संतोष को दोषी ठहराए जाने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन उसकी फांसी की सजा को यह कहते हुए उम्र कैद में तब्दील कर दिया कि कुछ बातें उसके पक्ष में जाती हैं। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में दोषी संतोष कुमार सिंह को फांसी की सजा सुनाई थी, जबकि निचली अदालत ने सबूतों के अभाव में संतोष को बरी कर दिया था। वहीं, सजा के एलान के बाद पिता चमन लाल मट्टू बेहद हताश हुए थे, उन्होंने संतोष के लिए फांसी की मांग की थी। बता दें कि प्रियदर्शिनी को माता-पिता अक्सर प्रिया ही कहकर बुलाते थे और दोस्त भी इसी नाम से पुकारते थे।प्रियदर्शिनी से एक तरफा प्यार करता था संतोष25 वर्षीय प्रियदर्शिनी डीयू के लॉ कॉलेज से LLB की पढ़ाई कर रही थी। संतोष भी लॉ का स्टुटेंड था और प्रशासनिक अधिकारी का बिगड़ैल बेटा था। बताया जाता है कि संतोष डीयू कैंपस में प्रियदर्शिनी को देखते ही उस पर लट्टू हो गया था और उसने उसे पाने की चाहत अपने दिल में पाल ली थी। वहीं, प्रियदर्शिनी के मन में ऐसा कुछ नहीं था। संतोष सिंह पासआउट हो गया था, लेकिन वह कैंपस में आता रहता था। उसके पास बुलेट बाइक थी, जिस पर वह कैंपस में घूमता रहता था। एक दिन उसने प्रियदर्शिनी से प्यार का इजहार भी किया था, लेकिन उसने साफ मना कर दिया। इसके बाद संतोष ने प्रियदर्शिनी को मानसिक रूप से परेशान शुरू कर दिया। वह उसके इर्द-गिर्द मंडराता रहता था।प्रियदर्शिनी को मिला था सुरक्षा गार्डसंतोष की हरकतों से प्रियदर्शिनी इस कदर घबरा गई थी उसने इस बाबत पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। इस पर प्रियदर्शिनी को दिल्ली पुलिस की ओर से पर्सनल सुरक्षा गार्ड में भी मिला था, जिनका नाम था हेड कॉन्स्टेबल राजिंदर सिंह। सुरक्षा में तैनात रहने के दौरान राजिंदर सिंह ने संतोष को कई बार चेतावनी भी दी, लेकिन वह नहीं माना और अपनी हरकतें नहीं छोड़ीं। इसके उलट संतोष ने पुलिस में प्रियदर्शिनी के खिलाफ ही पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी कि वह दो-दो डिग्रियां पाने के लिए एक साथ पढ़ाई कर रही है। इस पर प्रियदर्शिनी को सामने आकर सबूत तक देना पड़ा कि वह एम.कॉम की पढ़ाई पूरी कर चुकी है, अब एलएलबी की पढ़ाई कर रही है। यह मामला तो शांत हो गया, लेकिन संतोष के मन में एक ही धुन सवार थी कि उसे प्रियदर्शिनी को कैसे भी पाना है।23 जनवरी, 1996 को हुआ था कत्ल व दुष्कर्मयह महज इत्तेफाक था कि जिस दिन यानी 23 जनवरी, 1996 को प्रियदर्शिनी का कत्ल हुआ, उस दिन सुरक्षा में तैनात हेड कॉन्स्टेबल राजिंदर सिंह महज कुछ मिनट पहले तक नहीं पहुंच सके थे और यह बर्बर हत्याकांड हो गया। दरअसल, रोजाना की तरह 23 जनवरी, 1999 को भी राजिंदर सिंह को सुबह ही आना था, लेकिन उन्हें देरी हो गई। उस समय मोबाइल फोन जैसी सुविधा नहीं थी, ऐसे में राजिंदर लेट होने की जानकारी नहीं दे सके। कुछ देर इंतजार करने के बाद प्रियदर्शिनी अपनी मां के साथ डीयू चली गईं। रास्ते प्रियदर्शिनी ने अपने मम्मी-पापा को गाड़ी से तीस हजारी कोर्ट के पास उतारा फिर कॉलेज के लिए चली गई।यूं हुआ कत्लवहीं, राजिंदर सिंह को जानकारी मिली कि प्रियदर्शिनी डीयू चली गई है तो वह सीधे वहां पहुंच गए। यहां पर उन्होंने संतोष को घूमते देखा। इसके बाद 23 जनवरी, 1996 के दिन प्रियदर्शिनी दोपहर तक अपने घर पहुंच गई और उसने राजिंदर सिंह से शाम 5:30 बजे तक आने के लिए कह दिया था। शाम पांच बजे के आसपास घर पर कोई नहीं था, नौकर व रसोइया भी अपने-अपने काम से बाहर थे। इसी दौरान संतोष घर पर आया। बताया जाता है कि संतोष घर पर गया और उसने प्रियदर्शिनी के साथ दरिंदगी की और फिर काले रंग के हेल्मेट से उसे पीट-पीटकर मार डाला। इस दौरान हीटर के तार से उसने प्रियदर्शिनी का गला भी दबाया था। वहीं, जब राजिंदर सिंह अपने निर्धारित समय पर पहुंचे तो उनके साथ अन्य कांस्टेबल देव कुमार भी साथ थे। बेल बजाने पर भी दरवाजा नहीं खोलने उन्होंने पीछे के दरवाजे से जो देखा वह दहला देने वाला था। अंदर गए तो वहां पाया कि प्रियदर्शिनी की डेडबॉडी कमरे में डबल बेड पर पड़ी थी और मुंह से खून बहकर आसपास बिखर गया था और सांसें उखड़ चुकी थीं।हीटर के तार से घोंटा गया था प्रियदर्शिनी का गलाजांच में पुलिस ने कई सबूत जुटाए थे। डेड बॉडी के पास जांच के दौरान कांच के टुकड़ों के साथ हीटर का तार भी बरामद किया था, जिससे प्रियदर्शिनी का गला घोंटा गया था। पूछताछ के दौरान प्रियदर्शिनी की मां रागेश्वरी ने संतोष का नाम लिया था। उन्होंने पुलिस को यह भी बताया था कि किस तरह संतोष उनकी बेटी मानसिक रूप से परेशान करने के साथ धमकियां देता था। संतोष के पिता आइपीएस ऑफिसर थे और उनकी दिल्ली में पोस्टिंग होने वाली थी, ऐसे में प्रियदर्शिनी के परिजन बुरी तरह परेशान थे कि न्याय मिलने में अड़चन आएगी।रिपोर्ट में लिखा गया, नहीं हुआ प्रियदर्शिनी से दुष्कर्मसिस्टम कैसे ताकत के आगे बेबस होता है, जब जांच शुरू हुआ। मेडिकल रिपोर्ट में यहां तक लिख दिया गया कि दुष्कर्म तो हुआ ही नहीं। केंद्रीय जांच एजेंसी इस मामले की जांच कर रही थी। 1999 में जज जीपी थरेजा ने संतोष को सबूतों और गवाहों के अभाव में बरी कर दिया। इसके बाद पूरे देश में बवाल मचा।


Source: Dainik Jagran January 23, 2020 15:56 UTC



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