भास्कर के रिपोर्टर शिव ठाकुर के मुताबिक- 26 दिनों में हमने 1000 लोगों से बात की तो 900 से ज्यादा ने केजरीवाल को वोट देने की बात कही‘जितने लोगों से बात हुई, उनमें से 80% से ज्यादा ने पीएम पद के लिए नरेंद्र मोदी को ही पहली पसंद बताया, कहा कि केंद्र में मोदी जैसा नेता हो’शिव ठाकुर Feb 16, 2020, 08:31 AM IST Feb 16, 2020, 08:31 AM ISTदिल्ली में आज भीख भी मिलती नहीं उन्हें,था कल तलक दिमाग जिन्हें ताज-ओ-तख्त कामीर तक़ी मीर के इस शेर को आप अपनी समझ के हिसाब से भाजपा या कांग्रेस से जोड़कर देख सकते हैं। इस शेर के साथ इन दो पार्टियों का जिक्र सिर्फ इसलिए, क्योंकि 7 साल पहले तक यही दोनों दल थे, जो दिल्ली में सत्ता हासिल करने का दम रखते थे, लेकिन अब ये पार्टियां दहाई का आंकड़ा तक नहीं छू पा रहीं। कांग्रेस पिछले दो चुनावों से खाली हाथ है, वहीं भाजपा इस बार 300 से ज्यादा सांसद, मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की फौज उतारने के बाद भी सीटों का आंकड़ा 3 से 8 पर ही ले जा सकी। चुनाव के नतीजे क्या होंगे, ये दिल्लीवासी तो शुरू से ही जानते थे, लेकिन मेरे, आपके और बाकी देशवासियों के लिए ये समझना इतना आसान नहीं था। मैं अपनी बात करूं तो चुनाव कवरेज के लिए जब मैं दिल्ली पहुंचा तो शुरुआत के 3 दिनों में ही समझ आ गया कि आम आदमी पार्टी की टक्कर में भाजपा कहीं नहीं है। मैं कांग्रेस का जिक्र यहां नहीं कर रहा और इसका कारण बताना भी शायद जरूरी नहीं। एक और बात... मीर का यह शेर इसलिए लिखा क्योंकि पुरानी दिल्ली के कूचा चालान में मीर ने कई साल गुजारे। अहमद शाह अब्दाली ने जब दिल्ली पर कब्जा करने के बाद उसे लूटा तो वे लखनऊ चले गए। कहते हैं कि मीर दिल्ली को बड़ा याद करते थे और दिल्ली के लोगों की समझ की बड़ी तारीफ किया करते थे। दिल्ली को याद करते हुए ही उन्होंने इसे लूटने वालों के हश्र को बयां करते हुए यह शेर लिखा था।अब इतिहास में ज्यादा न उलझते हुए मुद्दे की बात करते हैं। ..तो कहानी कुछ ऐसी है कि 17 जनवरी को मैं दिल्ली पहुंचा और ठीक तीन दिन बाद जब भोपाल से एक साथी का कॉल आया। उसने पूछा- कौन जीत रहा है? वो शुरू हुआ और 1 घंटे में मुफ्त बिजली-पानी, महिलाओं को फ्री बस टिकट से लेकर सरकारी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई और सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं बेहतर करने जैसी केजरीवाल सरकार की योजनाओं की तारीफें करता रहा। उस बाशिंदे का नाम तो अब ध्यान नहीं लेकिन जो बातें उसने कही, वही बातें दिल्ली के हर कोने से सुनने को मिली।मोटे-मोटे तौर पर कहें तो इन 26 दिनों में अगर हमने 1000 लोगों से बात की तो 900 से ज्यादा लोगों ने इन्हीं चार मुद्दों के आधार पर केजरीवाल को वोट देने की बात कही। हां, यहां एक बात जरूर कहूंगा कि यहां जितने भी लोगों से बात हुई, उनमें से 80% से ज्यादा लोगों की पीएम पद के लिए पहली पसंद नरेंद्र मोदी ही थे। एक लाइन जो शायद 100 से ज्यादा बार सुनी, वो यही थी कि केंद्र में मोदी जी जैसा ही नेता होना चाहिए और दिल्ली में केजरीवाल। लोगों की यह राय 8 महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव से मिलती है, जब यहां की जनता ने सातों सीटें भाजपा को दी थी। लोकसभा चुनाव में 70 विधानसभा सीटों में से 65 पर भाजपा को लीड थी और बाकी 5 पर कांग्रेस। आम आदमी पार्टी वोट शेयर के मामले में भी तीसरे पायदान पर थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में जनता ने पूरा उलट मतदान किया। ओडिशा का चुनाव हो या दिल्ली का। केंद्र और राज्य के लिए जनता की अलग-अलग पसंद एक बात तो साफ करती है कि लोगों पर अब एक ही पार्टी का रंग नहीं है। वे अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर एक ही समय अंतराल में केन्द्र और राज्य के लिए अलग-अलग सरकारें चुन सकते हैं।चांदनी चौक विधानसभा में लोगों की प्रतिक्रियाअपने इस दौरे में मुझे केजरीवाल सरकार के खिलाफ बोलने वाले भी मिले, लेकिन इनकी संख्या कम ही थी। इन लोगों का कहना था कि बिजली-पानी तो सिर्फ गरीब तबके के वोट हासिल करने के लिए फ्री किए गए। पिछले 5 साल में नई सड़कें नहीं बनीं। ट्रैफिक इतना बेकार हो गया है कि हम बाजार जा रहे हैं, लेकिन वहां आज पहुंच पाएंगे या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं। एक शख्स ने तो यह तक कह दिया कि आप भोपाल से हैं। आपके राज्य के दो शहर इंदौर और भोपाल पिछले कुछ साल से सफाई के मामले में नम्बर-1 और नम्बर-2 हैं, लेकिन देश की राजधानी में हर जगह कूड़े के ढेर सड़ रहे होते हैं। इन लोगों का यह भी कहना रहा कि हमें नहीं पता होता है कि दिल्ली में कौन सा काम केजरीवाल सरकार के बस का है, कौन सा काम केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आता है और कौन सा काम दिल्ली की नगर निगमों के अंतर्गत आता है, लेकिन हम इतना कह सकते हैं कि जो भी काम केजरीवाल ने नहीं कराया, उसके लिए वे केन्द्र और एमसीडी की भाजपा सरकार को दोषी करार दे देते हैं। लेकिन जिन योजनाओं को अपनी उपलब्धियां बताकर वे लोगों से वोट मांग रहे हैं, क्या वो सब केंद्र की रजामंदी के बिना हो गया? बहरहाल, केजरीवाल सरकार के कामकाज से खुश लोगों की संख्या पहले दिन से आखिरी दिन तक ज्यादा ही रही। और वही नतीजों में भी दिखा। हां, ज्यादा पैसा जोड़ने वाले लोग केजरीवाल की योजनाओं से खुश नहीं थे, क्योंकि उनके लिए 5 साल में कुछ नहीं बदला था। शायद इसका कारण ज्यादा कमाई वाले लोगों का चुनाव के लिए उदासीन होना हो सकता है। दरअसल, दिल्ली में ज्यादा कमाई वाले कम ही लोग वोट देने के लिए निकलते हैं। इसके उलट कम कमाई वाले लोग वोटिंग में जमकर हिस्सा लेते हैं। वो कहते हैं ना कि वोट कीमती होता है, आप वोट देंगे तभी आपकी बात सुनी भी जाएगी, वोट नहीं देंगे तो कोई नेता भला क्यों आप पर ध्यान देगा। गरीब तबके के लोगों को इस बात की समझ है, शायद इसीलिए वे उत्साह के साथ वोट करते हैं। अमीर तबके को शायद सरकार से कोई मतलब नहीं। हां, ये बस कोई पूछे तो सरकार को कोस जरूर सकते हैं।कवरेज की इस भागदौड़ के बीच मैं दिल्ली की चटपटी गलियों में स्वाद के चटकारे भी लेता रहा। मूलचंद के पराठे से लेकर चांदनी चौक की रबड़ी जल
Source: Dainik Bhaskar February 16, 2020 03:00 UTC