ट्रंप का डॉलर वाला सपना: भारत-रूस-चीन के चक्रव्यूह में फंसा अमेरिका, दादागीरी अब होगी खत्म? - News Summed Up

ट्रंप का डॉलर वाला सपना: भारत-रूस-चीन के चक्रव्यूह में फंसा अमेरिका, दादागीरी अब होगी खत्म?


जागरण टीम, नई दिल्‍ली। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर और समृद्ध देश है। साल 1990 में सोवियत संघ के विघटन के बाद करीब तीन दशक तक अमेरिका को वैश्विक मंच पर कोई खास चुनौती नहीं मिली और इसका मुख्य कारण उसकी मुद्रा डॉलर है। वैश्विक मोर्चे पर आर्थिक व्यवस्था में डॉलर का प्रभुत्व बना हुआ है, लेकिन बीते कुछ वर्षों से वैश्विक मंचों पर चीन और भारत का उभार डालर के इस प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है।एक तरफ चीन जहां तमाम देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में कारोबार को बढ़ावा दे रहा है। वहीं, भारत, चीन, रूस और ब्राजील जैसे देशों का संगठन ब्रिक्स डॉलर से इतर अपनी मुद्रा लाने पर विचार कर रहा है। इससे अमेरिका को डॉलर की बादशाहत खतरे में नजर आ रही है।अगर डॉलर का वैश्विक प्रभुत्व कमजोर होता है तो इससे अमेरिका का आर्थिक दबदबा भी खत्म हो जाएगा। इसी खतरे को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप डी-डॉलराइजेशन के प्रयासों को बढ़ावा देने वाले देशों को टैरिफ समेत अन्य प्रकार की धमकी दे रहे हैं।इन देशों में रूस, चीन और भारत प्रमुख हैं। डी-डॉलराइजेशन के इस ट्रेंड पर अमेरिका की चिंता और इससे निपटने के लिए अपनाई जा रही है उसकी नीतियों की पड़ताल आज का अहम मुद्दा है... डॉलर का विकल्प तलाश रही है दुनिया डॉलर का दशकों से अंतरराष्ट्रीय आरक्षित मुद्रा के तौर पर प्रभुत्व रहा है। हालांकि, अब चीजें बदल रही हैं। रूस, चीन और भारत सहित कई देश अमेरिका से निर्भरता कम करने और अमेरिकी प्रतिबंधों के असर से बचने के लिए अपनी मुद्रा में दूसरे देशों से व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं।इसके अलावा केंद्रीय बैंक भी अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने के लिए बड़े पैमाने पर सोना खरीद रहे हैं। डॉलर के प्रभुत्व और डी- डॉलराइजेशन के मजबूत हो रहे ट्रेंड पर प्रकाश डाल रहे हैं महेन्द्र सिंह- साझा मुद्रा पर विचार कर रहे ब्रिक्स देश 40% वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है ब्रिक्स।26% वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी है ब्रिक्स के सदस्य देशों की।डोनाल्ड ट्रंप डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने की संभावना पर ब्रिक्स देशों को धमकी दे चुके हैं।क्या है डी-डालराइजेशन? डॉलराइजेशन का मतलब है- वैश्विक व्यापार, वित्त और विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कम करना। इसमें देश डॉलर के बजाए अन्य मुद्राओं जैसे- युआन, रूबल, रुपया या सोने का उपयोग करके अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के लिए मुद्रा के तौर पर डॉलर से अपनी निर्भरता घटाते हैं, ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों और विदेश नीति के प्रभावों से बचा जा सके और अपनी आर्थिक स्वायत्तता को कायम रखा जा सके।


Source: Dainik Jagran January 12, 2026 14:06 UTC



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