ज‍िस दिन नीत‍ि का पालन करना शुरू कर देंगे धर्म स्‍वयं ही स्‍थापित हो जाएगा - News Summed Up

ज‍िस दिन नीत‍ि का पालन करना शुरू कर देंगे धर्म स्‍वयं ही स्‍थापित हो जाएगा


सीताराम गुप्तारामकथा में जब रामदूत हनुमान लंका पहुंचते हैं तो रावण के आदेश से राक्षस उनको मारने के लिए दौड़ते हैं। तभी विभीषण वहां आ जाते हैं। इस अवसर का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस में कहते हैं, ‘नाइ सीस करि बिनय बहूता, नीति बिरोध न मारिअ दूता।’ अर्थात, विभीषण ने विनयपूर्वक कहा कि हनुमान एक दूत हैं और दूत को मारना नीति के विरुद्ध है। इससे थोड़ा स्पष्ट हो जाता है कि नीति क्या होती है। सरल भाषा में कहें तो नियम ही नीतियां होती हैं। ये संपूर्ण ब्रह्मांड ही नियमों से बंधा हुआ है। इसके अतिरिक्त हर जगह के ही कुछ न कुछ नियम होते हैं। एक राष्ट्र के भी नियम होते हैं तो एक समाज के भी नियम होते हैं।आदिकाल में जब मनुष्य जंगली अवस्था में रहता था तो ऐसे कोई नियम उसके ख्यालों में नहीं थे। जैसे-जैसे मनुष्य सभ्य होने लगा और विभिन्न सामाजिक इकाइयों का जन्म होने लगा, तो उनको नियंत्रित करने के लिए कुछ नियमों की जरूरत पड़ी। इन्हीं नियमों के फलस्वरूप धर्म का भी उद्भव और विकास होता चला गया। उसमें नई-नई बातें जुड़ने लगीं। उसका स्वरूप व्यापक होता चला गया। यदि स्थूल दृष्टि से धर्म पर विचार करें तो पाते हैं कि धर्म कुछ अच्छी बातों का समुच्चय ही तो है। संसार के हर धर्म में ऐसी बातें लिखी हुई हैं जिनका पालन करने से व्यक्ति और समाज दोनों का जीवन सुचारू रूप से संचालित होता रहता है।हर व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह धर्म के अनुसार आचरण करे। यही सबसे कठिन कार्य है। हम धर्मानुरागी तो हैं क्योंकि हम धर्म से प्रेम करते हैं, धर्म पर चर्चा भी करते हैं और दूसरों से भी यही चाहते हैं कि वे धर्म के मार्ग पर अग्रसर हों, लेकिन स्वयं उसे व्यवहार में नहीं लाते। नीति-नियम का पालन नहीं करते। वास्तव में धर्म को व्यवहार में लाने की रीति ही धर्म की नीति कहलाती है। इसे आचार पद्धति अथवा एक व्यापक आचार संहिता भी कह सकते हैं। हमारे संविधान में बहुत सारे कानून दिए गए हैं। साथ ही उनको लागू करने के लिए भी अलग से नियम बनाए गए हैं, जिससे उन्हें लागू करने में कठिनाई न आए। धर्म में भी इसी प्रकार की व्यवस्था को नीति कह सकते हैं। नीति व्यवहार की वह रीति है जिसमें स्वयं का विकास भी निहित हो और समाज को भी कोई बाधा न पहुंचे।धर्म और नीति में कोई विशेष अंतर नहीं होता। धर्म अच्छी बातों का समुच्चय है तो नीतियां उन्हें लागू करने की विधि। हर धर्म के कुछ प्रतीक होते हैं तो कुछ नीति निर्देशक तत्व होते हैं जो हमें विभिन्न ग्रंथों के रूप में मिलते हैं। इनका अध्ययन अच्छी बात है, लेकिन जब तक हम उनमें कही बातों को अपने व्यवहार में नहीं लाते, उनकी जानकारी का कोई महत्व नहीं। हम धर्मानुरागी तो हैं लेकिन धर्माचरण से थोड़ा दूर ही रहते हैं। हमें धर्माचरण के लिए भी प्रयास करना होगा। इन्हीं प्रयासों को नीति कहें तो गलत न होगा। जिस दिन इन नीतियों का पालन करना शुरू कर देंगे, धर्म हममें स्थापित हो जाएगा। इसके लिए बाह्य अनुष्ठान करने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। धर्म का पालन वास्तव में कर्त्तव्य का पालन ही होता है, और यदि हम ऐसा नहीं कर सकते, तो हमारा धर्म और हम अत्यंत संकुचित जीवन दृष्टि से पीड़ित हैं।


Source: Navbharat Times February 25, 2021 04:41 UTC



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