उत्तराखंड के सुदूर पूर्वी छोर पर जहां भारत और तिब्बत की सीमाएं मिलती हैं वहां करीब दर्जनभर गांव बसे हैं। ऐसे गांव जिनका इतिहास किसी उपन्यास जैसा काल्पनिक लगता है।उत्तराखंड के सुदूर पूर्वी छोर पर जहां भारत और तिब्बत की सीमाएं मिलती हैं वहां करीब दर्जनभर गांव बसे हैं। ऐसे गांव जिनका इतिहास किसी उपन्यास जैसा काल्पनिक लगता है।उपन्यास जैसे काल्पनिक इतिहास वाले ये समृद्ध गांव कभी मिनी यूरोप कहलाते थे, तिब्बत के साथ व्यापार के दम पर जहाज खरीदा था1962 से पहले गर्ब्यांग गांव तिब्बत से होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार का केंद्र हुआ करता था, यही इस गांव की संपन्नता का मुख्य कारण भी थाराहुल कोटियाल Jun 09, 2020, 05:51 AM IST Jun 09, 2020, 05:51 AM ISTपिथौरागढ़. उत्तराखंड के सुदूर पूर्वी छोर पर जहां भारत और तिब्बत की सीमाएं मिलती हैं, वहां हिमालय की तलहटी पर करीब दर्जनभर गांव बसे हैं। ऐसे गांव जिनका इतिहास किसी उपन्यास जैसा काल्पनिक लगता है। व्यास घाटी में बसा गर्ब्यांग गांव इन्हीं में से एक है।यह गांव इतने दुर्गम क्षेत्र में बसा है कि यहां पहुंचने के लिए कठिन पहाड़ी पगडंडियों पर दो दिन पैदल चलना होता है। हालांकि, दुर्गम होने के बाद भी गर्ब्यांग कभी बेहद संपन्न हुआ करता था। इसे ‘छोटा विलायत’ और ‘मिनी यूरोप’ कहा जाता था। गांव में दो-तीन मंजिला मकान हुआ करते थे जिनके बाहर लगे लकड़ी के खम्बों और दरवाजों पर खूबसूरत नक्काशी हुआ करती थी।दरअसल, 1962 से पहले गर्ब्यांग गांव तिब्बत से होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार का केंद्र हुआ करता था। यही इस गांव की संपन्नता का मुख्य कारण भी था। यूं तो व्यास घाटी के सभी गांव तिब्बत से होने वाले व्यापार में आगे थे, लेकिन सबसे बड़ा गांव होने के चलते गर्ब्यांग की संपन्नता सबसे अलग थी।इस गांव के रहने वाले नरेंद्र गर्ब्याल बताते हैं, ‘उस दौर में खेम्बू नाम के कोई व्यक्ति गांव में हुआ करते थे। बताते हैं कि वे अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए शिप (पानी का जहाज) खरीदने कलकत्ता गए थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जो गांव सभ्यता से पूरी तरह कटा हुआ था, वहां का निवासी अगर सिर्फ़ तिब्बत से होने वाले व्यापार के दम पर शिप खरीदने की हैसियत रखता था तो यह व्यापार कितना व्यापक रहा होगा।’गर्ब्यांग गांव के एक पुराने घर की खिड़कियों में की गई नक्काशी।धारचूला की इस व्यास घाटी में कुल 9 गांव पड़ते हैं। इनमें से 7 गांव भारत में हैं जबकि टिंकर और छांगरू नाम के दो गांव नेपाल में पड़ते हैं। ये सभी गांव मुख्य रुप से तिब्बत से होने वाले व्यापार पर ही निर्भर रहे हैं। इनके अलावा यहां की दारमा और चौदास घाटी में बसे गांव भी तिब्बत से होने वाले व्यापार में शामिल रहे हैं लेकिन उनकी भागीदारी व्यास घाटी के गांवों की तुलना में काफी कम रही है।चर्चित इतिहासकार शेखर पाठक बताते हैं, ‘भारत-तिब्बत व्यापार में एक समय इन गांवों का एकाधिकार हुआ करता था। यहां से मुख्यतः अनाज जाता था और तिब्बत से ऊन, रेशम, पश्मीना आदि आता था जो फिर पूरे तराई के इलाकों में जाया करता था। मांग बहुत अधिक थी और आपूर्ति करने वाले गांव के लोग सीमित थे। इस कारण व्यापार बहुत व्यापक था।’व्यास घाटी के ये गांव मुख्य भारत से भले ही कटे हुए थे, लेकिन अपने-आप में बेहद समृद्ध थे। संभवतः देश के सबसे समृद्ध गांवों में से थे। लेकिन, 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध ने इनसे इनकी समृद्धि छीन ली। भारत-तिब्बत व्यापार बंद हो गया और इसकी सबसे बड़ी आर्थिक मार इन्हीं गांवों पर पड़ी। भारत के मुख्य बाजारों से तो ये गांव पहले से बहुत दूर थे, अब तिब्बत के बाजार से भी ये दूर हो गए।भारत-चीन युद्ध के पूरे तीन दशक बाद, साल 1992 में यह व्यापार दोबारा शुरू हुआ। लिपुलेख दर्रा एक बार फिर से व्यापार के लिए खोल दिया गया, व्यास घाटी के लोग फिर से तिब्बत जाने लगे लेकिन वो समृद्धि कभी नहीं लौट सकी।शेखर पाठक बताते हैं, ‘तीस साल में बहुत कुछ बदल गया था। एक पूरी पीढ़ी निकल चुकी थी। व्यापार बंद हुआ तो गांव के लोगों ने बाकी विकल्प तलाश लिए थे। फिर इतने सालों में व्यापार के तरीके भी बहुत ज़्यादा बदल चुके थे। तिब्बत में अब पहले जैसी भूख नहीं थी। चीन वहां बहुत काम कर चुका था और बहुत कुछ पहुंचा चुका था। इस कारण वे पहले की तरह हम पर निर्भर नहीं थे।गर्ब्यांग गांव की एक पुरानी तस्वीर।1962 से 1992 के दौरान व्यापार पूरी तरह बंद रहा, भारत और तिब्बत दोनों में ही व्यापक बदलाव हो चुके थे। अंतरराष्ट्रीय व्यापार का स्वरूप बदल चुका था, उपभोग का पैटर्न बदल चुका था, बाजार बड़े हो गए थे और उनकी पहुंच गांव-गांव तक होने लगी थी। लिहाज़ा पारंपरिक व्यापार के केंद्र सिमटने लगे थे। इसीलिए कई लोग मानते हैं कि 1992 में भारत-तिब्बत व्यापार का दोबारा शुरू होना व्यापार के नजरिए से उतना अहम नहीं रह गया था, बल्कि इसका सिंबोलिक महत्व ही बचा था जो दोनों देशों के सुधरते हुए रिश्तों की गवाही देता था।हालांकि, उत्तराखंड के पूर्व मुख्य सचिव और व्यास घाटी के ही रहने वाले एनएस नपलच्याल इस तर्क से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं, ‘व्यापार का दोबारा शुरू होना सिर्फ सिंबोलिक नहीं था। क्षेत्रीय लोगों की यह जरूरत भी थी और उनकी मांग भी। कैलाश मानसरोवर यात्रा इस व्यापार से पहले ही 80 के दशक में दोबारा शुरू की जा चुकी थी। वो अपने-आप में सुधरते रिश्तों का प्रतीक थी।’एनएस नपलच्याल आगे कहते हैं, ‘व्यास घाटी के गांव आज भी अधिकतर सामान तिब्बत से ही लाते हैं। भवन निर्माण में लगने वाला अधिकतर सामान ऐसा होता है जो गांव वालों के लिए तिब्बत से लाना सस्ता है जबकि धारचूला (भारत) से ले जाना महंगा पड़ता है। इससे पता चलता है कि व्यापार का खुलना सिर्फ प्रतीक तो नहीं कहा जा सकता। ये जरूर है कि व्यापार अब उतना व्यापक नहीं रह गया जितना 1962 से पहले हुआ करता था।’तिब्बत सीमा से लगते भारत के आखिरी गांव कुटी की तस्वीर।व्यास घाटी के ये तमाम गांव हाल ही में मोटर रोड से जुड़े हैं। ये वही रोड ह
Source: Dainik Bhaskar June 09, 2020 00:17 UTC