गुजरात / दुष्कर्म पीड़िता के बच्चे से डीएनए मैच न होने पर भी सजा से नहीं बच सका आरोपी, 10 साल कैद की सजा - News Summed Up

गुजरात / दुष्कर्म पीड़िता के बच्चे से डीएनए मैच न होने पर भी सजा से नहीं बच सका आरोपी, 10 साल कैद की सजा


नाबालिग से शादी का दांव भी फेल, गर्भपात के लिए हाईकोट तक पहुंचा मामलादुष्कर्म से ठहरे गर्भ से जन्मे बच्चे को अपनाने से पीड़िता-परिवार ने कर दिया था इनकारDainik Bhaskar Dec 31, 2019, 05:40 AM ISTहिम्मतनगर. उत्तर गुजरात के विजयनगर में दिसंबर-2017 के दुष्कर्म मामले में स्थानीय अदालत ने आरोपी को 10 साल कैद की सजा सुनाई है। दुष्कर्म के फलस्वरूप जन्मे बच्चे से आरोपी का डीएनए मैच न होने पर भी आरोपी को सजा हुई। पीड़िता के बयान और अन्य सबूतों को महत्वपूर्ण मानते हुए ईडर के एडिशनल सेसन जज के.ए. पठान की अदालत ने यह व्यवस्था दी। 1.30 लाख का जुर्माना भी लगाया, इसमें से 1.20 लाख पीड़िता को बतौर मुआवजा देने का भी हुक्म दिया। पीड़िता और परिवार ने दुष्कर्म से जन्मे बच्चे को अपनाने से इंकार कर दिया था।शिशु-आरोपी का डीएनए नहीं हुआ मैच: अतिरिक्त सहायक अधिवक्ता प्रणय जे. सोनी ने बताया कि- आरोपी अनिल असारी और, पीड़िता और जन्मे शिशु के डीएनए सैंपल का मिलान करवाया। आरोपी और शिशु के डीएनए सैंपल मैच नहीं हुए हालांकि बच्चे और पीड़िता का डीएनए मैच हुआ। पीड़िता के बयान और मुखर सबूतों के चलते दुष्कर्मी को सजा हुई।नहीं चला पीड़िता से शादी का दांव: पीड़िता केसाथ आरोपी के शादी कर जीवन भर साथ निभाने का प्रस्ताव भी रखा गया। कोर्ट ने माना कि- किसी भी नाबालिग के साथ ऐसा कृत्य दुष्कर्म की श्रेणी में ही आता है। इसलिए माफ नहीं किया जा सकता।मामला दिसंबर-2017 का है। साबरकांठा के विजयनगर निवासी अनिल सवजीभाई असारी (20) को 08वीं की छात्रा से दुष्कर्म के आरोप में गिरफ्तार किया गया। पीड़िता के पेट में दर्द शुरू होने पर अस्पताल ले जाने पर यह मामला सामने आया था। गर्भपात के लिए गुजरात हाईकोर्ट तक मामला गया लेकिन गर्भस्थ शिशु की धड़कनें शुरू होने के चलते इजाजत नहीं मिली।हाईकोर्ट का भी है आधार जजमेंटबाल सुरक्षा अधिकारी एस.आर. केवट ने बताया कि- पीड़िता और इसका परिवार नहीं चाहता था कि-वह गर्भस्थ शिशु को जन्म दे। इसलिए हाईकोर्ट की शरण ली गई। हाईकोर्ट ने डॉक्टरों के पैनल से अभिप्राय मांगा। अभिप्राय में बताया गया कि- गर्भस्थ शिशु की धड़कन शुरू हो गई है, अत: गर्भपात संभव नहीं है। इस प्रक्रिया में ज्यादा समय जाया होने पर हाईकोर्ट ने लैडमॉर्क जजमेंट दिया। कहा- प्रशासन, पुलिस और कोर्ट को प्रस्तुत केस जैसे मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए निर्णय लेना चाहिए। साथ ही नाबालिग पीड़िता के बच्चे के प्रसव हेतु अहमदाबाद सिविल हॉस्पीटल में विशेष व्यवस्था करने तथा सेन्ट्रेल एडप्शन रिसोर्स एजेंसी के माध्यम से बच्चे को सरकार के अधीन लेने का आदेश दिया था।


Source: Dainik Bhaskar December 31, 2019 00:11 UTC



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