Hindi NewsMagazineAha zindagiGained Third Place In The World Mahakumbh Of Organic Farming, Agricultural Scientist Combining Tradition And ModernityAds से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐपखेतों के वैज्ञानिक: जैविक खेती के विश्व महाकुम्भ में तीसरा स्थान हासिल किया, परम्परा और आधुनिकता का संगम कर बने कृषि वैज्ञानिकडॉ. महेंद्र मधुप एक दिन पहलेकॉपी लिंककिसान-वैज्ञानिक कैलाश चौधरी ने कृषि उद्योग में ज़ीरो से हीरो बनने के लिए सफल फ़ॉर्मूला बनाया- बुवाई से बाज़ार तक परम्परा और आधुनिकता का संगम।अपनी निरंतर शोध-यात्रा की बदौलत जैविक खेती के विश्व महाकुंभ में वे तीसरे स्थान पर रहे। सुनते हैं उनकी कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी।उतार-चढ़ाव भरी रही ज़िंदगी। जयपुर जि़ले की कोटपूतली तहसील के कीरतपुरा गांव में जन्म हुआ। पिताजी देवकरण के पास चालीस बीघा ज़मीन थी, पर आवश्यक संसाधन नहीं। स्कूल जाते हुए समझ में आ गया कि खेती के साथ जब तक उसकी उपजों के मूल्य संवर्धन और बिक्री पर किसान का नियंत्रण नहीं होगा, सब बेमानी है। 1969 में दसवीं करने के बाद जब खेती से जुड़ा तो दृढ़ संकल्प लिया कि कीरतपुरा जीवनपर्यंत कर्मभूमि रहेगी। आधुनिक संसाधनों की कमी का रोना न रोकर पारम्परिक और आधुनिक कृषि उद्योग का संगम गांव में ही करना है। 1977 में निर्विरोध वार्ड पंच बनने से यह सोच शक्ल लेने लगी।जैविक खेती की शुरुआत1990 से शुरुआत की जैविक खेती की। भरपूर लाभ और ख़ूब वाहवाही मिली। 2001 में जैविक खेती के लिए पंजीकरण करवाया और 50 किसानों का समूह बनाया। गांव की जैविक खेती के लिए विशिष्ट पहचान बनी। उत्साहित होकर आंवले के चार सौ पेड़ लगाए। क़ीमत कम होने से जब घाटे का सौदा लगा तो गृह विज्ञान पढ़ी बहू ने परामर्श दिया कि गांव में ही पारम्परिक तौर पर आंवले के उत्पाद बनाकर आसपास के क़स्बों में बेचना चाहिए। इस सुझाव के क्रियान्वयन ने जीवन की दशा-दिशा ही बदल दी।मूल्य संवर्धन और बिक्रीप्रसंस्करण के बारे में जानने के लिए अनेक जगह गया। आंवले का उद्योग चलाने के बारे में सीखा। 2003 में एक कमरा बनाकर आंवला प्रसंस्करण शुरू किया। चौधरी एग्रो बायोटैक के नाम से फ़र्म पंजीकृत करवाई। उत्पाद आसपास के क़स्बों अौर जयपुर में बेचने लगा। तत्कालीन कृषि सचिव राधासिंह को मेरा कार्य बहुत पसंद आया। उन्होंने मुझे निःशुल्क सुविधाएं देने के लिए ‘सिफेट’ से कहा। वहां से आंवले की ग्रेडिंग और पंचिंग की मशीनें मिलीं। 2009 में के.एस. बायोफ़ूड्स के नाम से दूसरी फ़र्म बनाई। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद बना पाए। 2011 में ग्रीन हाउस बनाया। गेहूं के जवारे बनाकर बेचना लाभकारी रहा। 2014-15 में 110 टन आंवले का मूल्य संवर्धन किया। राज्य सरकार ने और पारंगत बनाने के लिए 2016 में इज़रायल भेजा। केंद्रीय अौर राज्य सरकार के महत्वपूर्ण विचार मंथनों में तब से अब तक सहभागी रहा। इन दिनों आंवले के मूल्य संवर्धन के लिए मशीन बनाने में जुटा हूं। साथ ही आंवले से सस्ते औषधीय खाद्य उत्पाद बनाने के लिए शोधरत हूं, जो असाध्य रोगों से लड़ने में कारगर सिद्ध होंगे।खेत पर प्रशिक्षणजैविक कृषि उत्पाद महिला सहकारी समिति, कीरतपुरा का गठन किया। जैविक खेती और खाद्य प्रसंस्करण के लिए 1,500 किसानों का समूह भी बनाया। आईसीएआर ने मेरे खेत को नवाचारी किसानों का प्रशिक्षण स्थल बनाया। देश-विदेश के किसान और विशेषज्ञ कृषि उद्योग में एक साधारण किसान की सफलता को समझने आते हैं।अभी तो शुरुआतजीवन के 71वें वर्ष में वैश्विक पहचान बनने के बाद भी लगता है कि अभी तो लंबी उड़ान भरनी है। सोलह वर्ष की अल्पवय में विवाह और कम शिक्षा कभी मेरी संकल्पसिद्धि में बाधक नहीं बन पाए। सम्पूर्ण परिवार हमारे संकल्पों को पूर्ण करने में एकसुर रहा। परिजन इस सफलता की रीढ़ रहे।सम्मान2004 में चंडीगढ़ में हर्बल उत्पाद के लिए प्रथम पुरस्कार।2010 में ‘आत्मा’ का ज़िलास्तरीय और दिल्ली में आईसीएआर का ‘उद्यान रत्न’ सम्मान।2016 में जैविक खेती के लिए राजस्थान सरकार द्वारा एक लाख रुपए सम्मान राशि और ग्रेटर नोएडा में 125 देशों के विश्व महाकुंभ में तृतीय सम्मान ‘धरती मित्र’ अौर दो लाख रुपए सम्मान राशि।2017-19 तक चार ‘खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान।सम्पर्क करें -किसान-वैज्ञानिक कैलाश चौधरी, गांव- कीरतपुरा, तहसील- कोटपूतली- 303108, ज़िला- जयपुर (राजस्थान), वेबसाइट : www.ksbiofood.biz ईमेल : ksbiofoods@gmail.com मोबाइल : 9829083117
Source: Dainik Bhaskar April 24, 2021 23:35 UTC