पंकज श्रीवास्तव, नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। देशभर में आवारा श्वानों के बढ़ते हमलों और उनके नियंत्रण को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है। कोर्ट की सख्ती के बावजूद मध्य प्रदेश में हालात चिंताजनक हैं। कागजों में योजनाएं तैयार हैं, बजट के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर काम लगभग ठप है। राजधानी भोपाल सहित प्रदेश के बड़े शहरों में शेल्टर होम और एबीसी (एनिमल बर्थ कंट्रोल) केंद्रों का निर्माण अब तक शुरू नहीं हो सका है, जबकि 13 जनवरी की समयसीमा कब की बीत चुकी है।कोर्ट के निर्देशों के बाद नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने आनन-फानन में प्रदेशभर की स्थिति का ब्योरा तैयार किया है। मुख्य सचिव खुद राज्य का पक्ष रखने जाएंगे। हालांकि हकीकत यह है कि राजधानी सहित किसी भी शहर में अब तक एक भी शेल्टर होम तैयार नहीं हुआ है। कोर्ट का आदेश था कि 13 जनवरी तक जमीन का चयन कर निर्माण कार्य शुरू कर दिया जाए, लेकिन वित्तीय इंतजाम न होने से धरातल पर एक ईंट तक नहीं रखी गई।राजधानी में सवा लाख श्वान भोपाल में करीब 1.25 लाख आवारा श्वानों की मौजूदगी बताई जा रही है। यहां पांच शेल्टर होम बनने थे, जिनमें से केवल दो के लिए जगह का चयन हो पाया, लेकिन वहां भी काम शुरू नहीं हो सका। इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन में भी पांच-पांच शेल्टर होम प्रस्तावित थे, मगर इन शहरों में तो जमीन का चयन तक नहीं हुआ है। नगर निगम स्तर पर तीन-तीन और जिला मुख्यालयों के नगरीय निकायों में दो-दो शेल्टर होम बनाए जाने थे, लेकिन सभी योजनाएं फाइलों तक सिमटी हैं। फंड की कमी सबसे बड़ी बाधा अधिकारियों का कहना है कि सबसे बड़ी समस्या फंड की उपलब्धता है। शेल्टर होम निर्माण के लिए बजट का इंतजाम नहीं हो पाया है, जिससे परियोजनाएं रुकी हुई हैं। जबकि नियमानुसार 300 श्वानों के लिए शेल्टर होम पर अधिकतम 27 लाख रुपये और 200 श्वानों के लिए 15 लाख रुपये तक की अनुदान राशि मिल सकती है। इसके अलावा एनजीओ, पशु प्रेमी संगठन और सीएसआर फंड के जरिए भी यह कार्य कराया जा सकता है, लेकिन इन विकल्पों पर ठोस पहल नहीं की गई।
Source: Dainik Jagran January 28, 2026 08:50 UTC