ललित गर्गसफलता और संघर्ष, आशा और निराशा, हर्ष और विषाद साथ-साथ चलते हैं। चुनौतियां केवल बुलंदियों को छूने की नहीं होतीं, खुद को वहां बनाए रखने की भी होती हैं। ठीक है कि एक काम करते-करते हम उसमें कुशल हो जाते हैं। उसे करना आसान हो जाता है। पर वही करते रह जाना, हमें अपने ही बनाए सुविधा के घेरे में कैद कर लेता है। रोम के महान दार्शनिक सेनेका कहते हैं, ‘कठिन रास्ते ही हमें ऊंचाइयों तक ले जाते हैं।’ प्रश्न है कि इन कठिन रास्तों पर डग भरने एवं कुछ अनूठा करने का साहसिक प्रयत्न तो कोई शुरू करे। मगर प्रश्न तो यह भी है कि अंधेरों से संघर्ष करने के लिए आगे आए कौन? कौन उस साहसिक प्रयत्नों की संस्कृति को सुरक्षा दे? कौन आदर्शों के अभ्युदय की अगवानी करे? कौन जीवन-मूल्यों की प्रतिस्थापना में अपना पहला नाम लिखवाए? जब शुरुआत में ही लगने लगे कि जो काम मैं अब तक नहीं कर सका, भला दूसरा कैसे कर सकेगा?
Source: Navbharat Times June 10, 2020 03:00 UTC