गौर करने वाली बात है कि ये फिलहाल वादे हैं और कानूनी रूप से इनका पालन किया जाना जरूरी नहीं है। हालांकि अमेरिकी सरकार का मानना है कि सार्वजनिक रूप से किए गए ये वादे कंपनियों की जिम्मेदारी तय करेंगे।बता दें कि अमेरिका में लोगों को डर है कि AI का अंधाधुंध इस्तेमल और विकास न सिर्फ बिजली के बिल बढ़ाएगा बल्कि पर्यावरण को भी खतरे में डालेगा।इसके अलावा पेंसिल्वेनिया के गवर्नर जोश शापिरो ने डेटा सेंटर डेवलपर्स के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं। इन नियमों में डेटा सेंटर्स को अपने बिजली खर्च का बिल खुद उठाने और स्थानीय लोगों को नौकरी देने के साथ-साथ पानी के संरक्षण के लिए जरूरी स्टैंडर्ड का पालन करने को कहा गया है।अमेरिकी नागरिकों की जेब को डेटा सेंटर्स के बिजली बिल के भार से बचाने के लिए अमेरिकी सीनेटर्स ने ऐतिहासिक विधेयक पेश किया है। इसे 'गारंटींग रेट इंसुलेशन' या 'GRID' एक्ट कहा जा रहा है। इसका मकसद दो चीजों की गारंटी देना है। पहला, ये कि डेटा सेंटर्स की वजह से उपभोक्ताओं के बिल में कोई बढ़ोत्तरी नहीं होगी। इसके अलावा बिजली ग्रिड्स पर पहला हक आम लोगों का होगा न कि टेक दिग्गजों का। इस बिल की वजह से डेटा सेटंर्स को ऑफ ग्रिड साधनों से बिजली जुटानी पड़ेगी जैसे कि सौर्य या पवर उर्जा से।ट्रंप सरकार गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और अमेजन जैसी कंपनियों पर एक समझौते पर हस्ताक्षर करने का दबाव बना रही है। इसके अनुसार कंपनियों को उनके AI और डेटा सेंटर के बिजली के खर्चों को खुद ही उठाना होगा। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका की उन्नति के लिए डेटा सेंटर्स जरूरी हैं लेकिन टेक कंपनियों को अपना रास्ता खुद बनाना होगा और अपना बिल भी खुद ही भरना होगा।